Tuesday, June 17, 2014

Soccer or Farming, If you Know the Problem Remedy will Happen - Management Funda - N Raghuraman - 17th June 2014

फुटबॉल हो या खेती, समस्या समझें तो समाधान हो जाएगा


मैनेजमेंट फंडा - एन. रघुरामन


दक्षिण अफ्रीका के मलावी में गैब्रियल छोटे किसान हैं। उनके पास दो एकड़ जमीन है। इस 30 साल के किसान के होंठों पर मुस्कुराहट है, क्योंकि तीन महीने की मेहनत के बाद खेत में मक्के की बंपर पैदावार हुई है। परिवार में पत्नी, दो बच्चे व माता-पिता हैं। लेकिन आठ साल पहले गैब्रियल के लिए इनका पेट भरना मुश्किल था। उस दौर में उन्हें परिवार के लिए दो वक्त के भोजन का इंतजाम करने के लिए दूसरों के खेतों में भी काम करना पड़ता था। 

2011 के बाद उनके हालात में सुधार हुआ और लगातार स्थिति सुधरती गई। कैसे हुआ यह सब? साल 2010 में उन्होंने अपना नाम एक खास कार्यक्रम के लिए रजिस्टर कराया। इस कार्यक्रम में किसानों को खेतों में पैदावार बढ़ाने के टिप्स दिए जाते थे। इससे गैब्रियल को काफी फायदा हुआ। 

 Source: Soccer or Farming, If you Know the Problem Remedy will Happen - Management Funda - N Raghuraman - Dainik Bhaskar 17th June 2014

Gulzar, Satyajit Ray and Children Films - Parde Ke Peeche - Jaiprakash Chouksey - 17th June 2014

गुलजार, सत्यजीत रॉय और बाल फिल्में


परदे के पीछे - जयप्रकाश चौकसे


गुलजार का लिखा नाटक पंद्रह जून को मुंबई के पृथ्वी थियेटर में मंचित हुआ जिसे देखने का अवसर नहीं मिला। यह नाटक सत्यजीत रॉय की 1969 में प्रदर्शित संगीतमय फिल्म 'गोपी गायेन बाघा बाएन' से प्रेरित है।

ज्ञातव्य है कि सत्यजीत रॉय ने यह फिल्म अपनेे दादा उपेंद्र किशोर राय चौधरी महोदय की कथा से प्रेरित होकर बनाई थी। इस परिवार की तीन पीढिय़ां बच्चों के लिए साहित्य रचती रही हैं।

गुलजार भी बच्चों के वार्षिक मेले में जाते रहे हैं और उन्होंने बच्चों के लिए एक फिल्म 'किताब' भी रची थी। गुलजार के व्यक्तित्व और सिनेमा में बंगाल का प्रभाव हमेशा रहा है। उन्होंने विमलराय के सहायक के रूप में कॅरिअर प्रारंभ किया था और उन्हें 'बंदिनी' में एक गीत लिखने का अवसर भी मिला।

ऋषिकेश मुखर्जी की अनेक फिल्में उन्होंने लिखी हैं और बतौर निर्देशक भी उनकी पहली फिल्म 'मेरे अपने' बंगाली फिल्म 'अपन जन' से प्रेरित थी। उनकी पत्नी भी बंगाली राखी हैं।


Source: Gulzar, Satyajit Ray and Children Films - Parde Ke Peeche By Jaiprakash Chouksey - Dainik Bhaskar 17th June 2014

Friday, June 13, 2014

Things Don't Get You Respect - Management Funda - N Raghuraman - 13th June 2014

सामान से सम्मान नहीं मिलता


मैनेजमेंट फंडा - एन. रघुरामन



पहली कहानी: 



बिनीता सोरेन झारखंड में सरायकेला-खरसवान जिले के केसोसोरा गांव की आदिवासी लड़की है। वह बछेंद्री पाल से काफी प्रभावित है। बछेंद्री खुद उत्तराखंड में उत्तरकाशी के एक छोटे से गांव की रहने वाली हैं। उन्होंने सिर्फ 29 साल की उम्र में माउंट एवरेस्ट पर चढऩे में कामयाबी हासिल की। यह उपलब्धि हासिल करने वाली भारत की पहली महिला बनीं।

बिनीता भी बछेंद्री के पदचिन्हों पर चलना चाहती थीं। माउंट एवरेस्ट फतह करना चाहती थीं। लेकिन उनके सामने पैसे की दिक्कत थी। टाटा स्टील ने बिनीता की इच्छा और उसका इरादा देखा तो उसकी मदद को आगे आई। कंपनी 25 लाख रुपए खर्च करने को तैयार हो गई ताकि उसकी एवरेस्ट यात्रा सफल हो सके। यह बात है 2012 की। बिनीता ने भी निराश नहीं किया। वह एवरेस्ट की चोटी तक पहुंचने वाली दूसरी भारतीय महिला बनी।

Source: Things Don't Get You Respect - Management Funda - N Raghuraman - Dainik Bhaskar 13th June 2014

Mahesh Bhatt - Ruminating Memories - Parde Ke Peeche - Jaiprakash Chouksey - 13th June 2014

महेश भट्ट यादों की जुगाली के दौर में


परदे के पीछे - जयप्रकाश चौकसे



कुछ दिन पूर्व महेश भट्ट की हंसल मेहता निर्देशित 'सिटी लाइट्स' का प्रदर्शन हुआ। यह फिल्म ब्रिटिश-फिलीपेनो सहयोग से बनी ''मनीला मेट्रो'' से प्रेरित थी और बाकायदा अधिकार खरीद कर बनाई गई है। इसका नायक अपने परिवार सहित रोजी रोटी की तलाश में राजस्थान से मुंबई आता है और उन्हें अनेक कष्ट झेलने पड़ते हैं। 

मुंबई में घर का सपना अनेक धूर्त व्यापारी दशकों से बेच रहे हैं और राजकपूर की श्री 420 में भी यह समस्या प्रस्तुत हुई थी। राजकपूर की आवारा, श्री 420 और 'जागते रहो' के नायक गांवों से रोजी रोटी की तलाश में महानगर आते हैं जो अपनी निर्मम चक्की में उनके सपने, शरीर और आत्मा पीस देता है। 


 Source: Mahesh Bhatt  - Ruminating Memories - Parde Ke Peeche By Jaiprakash Chouksey - Dainik Bhaskar 13th June 2014

Thursday, June 12, 2014

It is Necessary to See How Your Idea is Shaping Up - Management Funda - N Raghuraman - 12th June 2014

यह दॄष्टि ज़रूरी है कि आपका आईडिया कैसा आकार लेगा


मैनेजमेंट फंडा - एन. रघुरामन


दिल्ली के लोधी गार्डन को एक बड़ा ऑक्सीजन टैंक कह सकतें है, क्योंकि यहां हर तरह के पेड़ है। ढेरों लोग यहां सुबह-शाम वाक के लिए आतें हैं। योगेश सैनी भी उन लोगों में शामिल हैं। पिछले साल एक रोज सुबह के वक़्त उन्होंने देखा निगम के लोग गार्डन के पुराने कचरादानों को बदलकर नए लगा रहे हैं।

फिर अगले दिन देखा कि नए कचरादानों के इर्द-गिर्द काफी कचरा पड़ा हुआ है, क्योंकि लोग कचरादान में कचरा नहीं डाल पा रहे हैं। वह यहां-वहां गिर जाता है। अक्सर शाम के वक्त पार्क का स्टाफ इधर-उधर पड़े कचरे को इकट्ठा कर उसे कचरादान में डालते देखा जा सकता था।

Source: It is Necessary To See How Your Idea is Shaping Up - Management Funda By N Raghuraman - Dainik Bhaskar  12th June 2014 

Fun n Frolic at Educational Campuses - Parde Ke Peeche - Jaiprakash Chouksey - 12th June 2014

शिक्षा परिसर की मौजमस्ती

 

परदे के पीछे - जयप्रकाश चौकसे


नए चमकीले भारत में होने वाले परिवर्तन और आबादी के चालीस प्रतिशत युवा लोगों को समझने में कुछ हद तक सहायता स्कूल एवं कॉलेज के परिसर में होने वाली हलचल से मालूम की जा सकती है। विगत दो दशकों से कॉलेज कैम्पस अनेक फिल्मों का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है, परंतु फिल्मों में प्रस्तुत परिसर यथार्थ से कोसों दूर उसी वृहत फंतासी का हिस्सा है जिससे आज खूब बेचा जा रहा है। 

करण जौहर को यह खुशफहमी है कि उनकी फिल्म 'स्टूडेंट ऑफ द इयर' एक महान फिल्म है और युवा अवचेतन का प्रतिनिधित्व करती है। इस फिल्म में दिखाए शिक्षा संस्थान जैसा कोई भव्य परिसर विश्व के किसी भी शिक्षा संस्थान का नहीं हो सकता। भव्यता को जौहर महानता समझते हैं और उनका मानस तथा सिनेमा में भव्यता के प्रति घोर सम्मान मूर्ख बालक की जिद की तरह है। उनकी फिल्म में एक भी दृश्य कक्षा का नहीं है। 


Source:  Fun n Frolic at Educational Campuses - Parde Ke Peeche - Jaiprakash Chouksey - Dainik Bhaskar 12th June 2014

Wednesday, June 11, 2014

Best People Make Best Nation - Management Funda - N Raghuraman - 11th June 2014

श्रेष्ठ राष्ट्र सिर्फ बेहतर लोगों से ही बन सकता है


मैनेजमेंट फंडा - एन. रघुरामन



पहली कहानी: 


हाल में ही कवयित्री माया एंजेलो का निधन हुआ। तो इंटरनेट पर उनके कहे शब्दों की जैसे बाढ़ सी आ गई। ऐसा ही उनका एक कथन है, 'लोग आपकी कही बातें भूल जाएंगे। वे आपके किए कामों को भी भूल जाएंगे। लेकिन आपने उन्हें जो अहसास कराया, उसे वे कभी नहीं भूलेंगे।

' एंजेलो ने यह बात अपने अनुभव से, अपनी सीख के आधार पर कही थी। वह सीख जो उन्हें 17 साल की उम्र में ही मिल गई थी। उस वक्त वह मां बन चुकी थीं। बच्चे का अकेले पालन-पोषण कर रही थीं। अपने और उस बच्चे का पेट पालने के लिए एक होटल में वेटरेस की नौकरी करती थीं। 

Source: Best People Make Best Nation - Management Funda By N Raghuraman - Dainik Bhaskar 11th June 2014

Real Lives of Child Artiste - Parde Ke Peeche - Jaiprakash Chouksey - 11th June 2014

बाल कलाकारों का यथार्थ जीवन


परदे के पीछे - जयप्रकाश चौकसे 


आउटलुक की फिल्म समीक्षक डोला मित्रा ने कौशिक गांगोली की फिल्म 'अपुर पांचाली' पर अत्यंत सारगर्भित लेख लिखा है जो मिथ बनाम सत्य के गहरे पक्ष को प्रस्तुत करता है। ऑस्कर जीतने वाली 'स्लमडॉग मिलियनेयर' में जिन बच्चों ने शूटिंग की थी, आज वे कहां हैं और विश्व प्रसिद्धि की लाइम लाइट हटने के बाद उन्होंने यथार्थ जीवन का किस तरह मुकाबला किया, क्योंकि एक बार प्रसिद्ध होने के बाद साधारण जीवन ढोना अत्यंत कठिन हो सकता है। 

चार्ली चैपलिन की 'द किड' के बच्चे का भी शेष जीवन कठिनाइयों में बीता। राजकपूर की 'बूट पॉलिश' की बेबी नाज और रतन कुमार को भी ताउम्र संघर्ष करना पड़ा क्योंकि लाइम लाइट फिर लौटकर नहीं आई। इसी तरह बचपन में बहादुरी के कार्य करके राष्ट्रपति से पुरस्कार होने वाले बच्चे भी 'पल दो पल के शायर' होते है और बाद में गुमनामी के अंधेरे उन्हें लील लेते हैं। 

Source: Real Lives of Child Artiste - Parde Ke Peeche By Jaiprakash Chouksey - Dainik Bhaskar 11th June 2014