Wednesday, February 5, 2014

For Better Results Go To The Bottom of The Issue - Management Funda - N Raghuraman - 5th February 2014

बेहतर नतीजे के लिए मसले की तह तक जाएं



मैनेजमेंट फंडा - एन. रघुरामन


पहली कहानी: 

 
आदमखोर बाघ या तेंदुआ के बारे में सुनकर ही इंसान कांप जाता है। लेकिन इंसान के सामने इससे भी बड़ी समस्या कर्नाटक में हाथी खड़ी कर रहे हैं। बाघ या तेंदुआ आम तौर पर इंसानों की बस्तियों में नहीं जाते। लेकिन हाथियों के साथ ऐसा नहीं है। वे इंसानों के दोस्त होते हैं और कभी उनके लिए परेशानी भी बन जाते हैं। मैसूर और कुर्ग जिलों के बीच बने नागरहोल नेशनल पार्क के लिए फॉरेस्ट अफसर भी इसी परेशानी से जूझ रहे हैं। इस नेशनल पार्क के बाघ-तेंदुओं ने पिछले चार साल में एक-दो मौकों पर ही इंसानों को हानि पहुंचाई है। लेकिन हाथी छह लोगों को मार चुके हैं। 28 लोगों को घायल भी कर चुके हैं। 
 
Source: For Better Results Go To The Bottom of The Issue - Management Funda By N Raghuraman - Dainik Bhaskar 5th February 2014

यही नहीं जंगली हाथी नेशनल पार्क के आसपास के खेतों की फसलें भी नष्ट कर देते हैं। दूसरे जानवर शायद ही कभी खेतों को नुकसान पहुंचाते हों। हिरण या सुअर वगैरह थोड़ी-बहुत फसल ही नष्ट करते हैं। लेकिन हाथी पूरे खेत की फसल को तबाह अकेला ही काफी है। यहां वन विभाग ने कई तरीके अपनाए हैं। इनमें से एक है, जंगल के क्षेत्र की बैरीकेडिंग करना। ताकि हाथी जंगल से बाहर न जा सकें। लेकिन हाथी कई बार हमारी-आपकी सोच से ज्यादा होशियार निकलते हैं। वे इस बैरीकेड को पार करने के नए-नए रास्ते निकाल लेते हैं। इन बैरीकेड को पार करने में वे एक-दूसरे की मदद भी करते हैं। एक हाथी को रोज अमूमन 250 किलोग्राम घास की जरूरत होती है। उनका सबसे पसंदीदा भोजन है-बांस की पत्तियां। पिछले सप्ताह जब मैं जब नागरहोल घूमने गया तो देखा कि वहां बांस के हजारों पेड़ उखड़े पड़े हैं। उनके गट्ठर बना दिए गए हैं और उन्हें जंगल से बाहर ले जाया जा रहा है। ये बांस अपनी उम्र पूरी कर चुके थे। बांस के उम्र अमूमन 45 साल मानी जाती है। इनकी जगह जंगल में बांस के नए पेड़ लगे नहीं होंगे। और लगे भी होंगे तो वे उतने बड़े नहीं हुए होंगे कि हाथियों के काम आ सकें। यानी हाथियों के लिए उनके पसंदीदा भोजन की कमी। जाहिर है, ऐसे में वे पेट भरने के लिए जंगल से बाहर ही निकलेंगे। पिछले कई सालों से नेशनल पार्कों के बीच या आसपास से निकली रेल लाइनों पर हाथियों के मारे जाने की खबरें आती रही हैं। इन घटनाओं के पीछे भी यही वजह है। भूख मिटाने के लिए उनका जंगल से बाहर निकलना।

दूसरी कहानी: 

 
कुछ साल पहले पुणे महानगरपालिका ने बेघर लोगों के लिए रिहायशी बिल्डिंग बनाकर देने का फैसला किया। सीनियर अफसरों ने इस तरह के 38 मकान बनाने का निर्णय लिया। एक मकान में 100 लोगों के रहने की गुंजाइश थी। हर मकान के निर्माण की लागत थी करीब एक लाख रुपए। तभी किसी बुद्धिमान व्यक्ति ने सवाल पूछ लिया कि शहर में वास्तव में बेघर लोग हैं कितने? महानगरपालिका के अफसर अचानक हरकत में आए। उन्होंने एक सर्वे कराया। इसमें पता लगा कि पूरे शहर में बेघर लोग सिर्फ 1,000 ही हैं। लिहाजा, योजना के तहत बनाए जाने वाले मकानों की संख्या 38 से घटाकर 10 कर दी गई। फिर 2011 की जनगणना के आंकड़े आ गए। उसमें बताया गया कि पुणे शहर में बेघर लोगों की आबादी 1,454 है। महानगरपालिका के अफसरों को अपनी योजना में फिर तब्दीली करनी पड़ी। अब मकानों की संख्या बढ़ाकर 10 से 16 कर दी गई। इस कवायद में 2013 आ गया। तभी दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार अस्तित्व में आ गई। उस सरकार ने बेकार हो चुकी बसों को ही दिल्ली में बेघरों का रैनबसेरा बना दिया। इस नए आइडिया से पुणे के अफसर बेहद प्रभावित हुए। उन्होंने एक टीम भेजी जो दिल्ली सरकार के इस नुस्खे से कुछ सीख हासिल करे। पुणे का ट्रांसपोर्ट डिपार्टमेंट हर साल करीब 100 बसों को कंडम घोषित कर देता है। इन बसों को बेचने से कोई ज्यादा पैसे भी नहीं मिलते। लेकिन इन्हें रैनबसेरों मेंतब्दील कर देने पर पैसों की बचत जरूर ज्यादा होगी। 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
Source: For Better Results Go To The Bottom of The Issue - Management Funda By N Raghuraman - Dainik Bhaskar 5th February 2014