Sunday, June 22, 2014

A Successful Business Depends On Changing Lives of People - Inspirational and Motivational Story in Management Funda - N. Raghuraman - 22nd June 2014

बिजनेस की सफलता लोगों की जिंदगी के बदलाव पर निर्भर है


मैनेजमेंट फंडा  -  एन. रघुरामन 



मैथली स्वामी को बचपन में उसके पिता ने यह कहकर डांटा था कि उसमें बकरी तक चराने की काबिलियत नहीं है। पिता की यह डांट 2008 तक भविष्यवाणी की ही तरह सच रही और मैथली वास्तव में अपने छह सदस्यीय परिवार के लिए दो जून की रोटी जुटाने तक में मदद नहीं कर पाई। जबकि उसकी अन्य बहनें जैसे-तैसे कर कमाने-खाने में सफल रहीं। यह वाकया केरल के कुन्नूर गांव का है।

यह वही समय था जब 'गोट विलेज' के नाम से बकरियों की नस्ल को सुधारने का एक बड़ा प्रोजेक्ट लाया गया था। इसमें स्थानीय निगम के अलावा, नाबार्ड, कृषि विज्ञान केंद्र, कॉर्पोरेटिव सोसायटी समेत अन्य घटक शामिल थे। यह प्रोजेक्ट कुंडुबश्री मिशन के 'समग्र' स्कीम का अहम हिस्सा बन गया। इसका लक्ष्य ग्रामीणों को मालाबार बकरी के माध्यम से अतिरिक्त लाभ दिलाना था। 
Source: A Successful Business Depends On Changing Lives of People - Management Funda By N. Raghuraman - Dainik Bhaskar 22nd June 2014
मैथली भी इस नए अभियान की सदस्य बन गई। चार से पांच महिलाओं का एक ग्रुप बनाया गया था। जिसे नेबरहुड ग्रुप नाम दिया गया था। वे सभी जिले के अलग-अलग पंचायतों की थी। कुंडुबश्री मिशन के तहत बकरी नस्ल सुधार के इस मिशन से लाभ कमाने का यह जरिया दूसरे जिलों और पंचायतों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बनता चला गया।

अब तक इस बकरी नस्ल सुधार स्कीम के तहत करीब 959 नेबरहुड ग्रुप बन चुके हैं। हर गु्रप में पांच सदस्य हैं। ये सभी इस योजना का लाभ उठा रहे हैं। जबकि 400 नए ग्रुप बैंक से फंड जारी होने का इंतजार कर रहे हैं। इस स्कीम के तहत ग्रुप के प्रत्येक परिवार को चार बकरियां पालनी होती हैं। इनसे पैदा होने वाली अतिरिक्त बकरियों को वे बेच सकते हैं। कुन्नूर डिस्ट्रिक्ट गोट ब्रीडिंग सोसायटी के मुताबिक स्थानीय स्तर पर आयोजित किए जाने वाले बकरी मेले में ग्रामीणों को बकरियां बेचने का मौका मिलता है। ऐसे मेलों में हजारों बकरियां प्रजनन के लिए बेची गई थीं। अब त्योहार के समय फिर से बकरी मेला आयोजित किया जाएगा। जिसमें इन्हें मीट के लिए बेचने की योजना है।

केडीजीबीएस उत्पादकों को मेले के जरिए या फिर ग्राहकों के सीधे आदेश से बकरी बेचने में मदद करता है। इसमें विक्रेता को २५० रुपए प्रति किलो की दर से बकरी का मूल्य मिल जाता है। एक छोटे मेले में करीब १५० तक बकरियां बिकती हैं। अगर सही तरीके से इस व्यवसाय को किया जाए तो एक परिवार साल भर में बकरी के बिजनेस से 10 लाख रुपए तक कमा सकता है। क्योंकि मालाबार नस्ल की बकरी जल्दी बड़ी हो जाती है। इससे ग्रुप के प्रत्येक सदस्य को दो लाख रुपए तक की कमाई संभव है। पिछले तीन साल में 56 बकरी मेले आयोजित किए गए थे। इसमें करीब 2.20 करोड़ की बकरियां बेची गई थीं।

मेले का आयोजन बेहद व्यवस्थित ढंग से होता है। इसमें प्रत्येक बकरे का वजन लेने के बाद एक टैग लगाया जाता है। इससे खरीदार उसका वजन के हिसाब से कीमत का आकलन आसानी से कर सकता है। थिलांकेरी नामक सोसायटी ने बकरी की खाद बनाने की यूनिट लगाई है। उसकी योजना बकरी के दूध, मीट प्रोसेसिंग यूनिट और घास उत्पादन करने की भी है।

इस तरह का देश में केवल एक ही प्रोजेक्ट राजस्थान के धौलपुर में चल रहा है। इससे महिलाओं के अनेक ग्रुप जुड़े हुए हैं। इन्हें वित्तीय मदद देने से पहले धौलपुर में प्रशिक्षण दिया गया था।

इस योजना की सफलता तथा लोगों को इसके प्रति आकर्षित करने का श्रेय इसकी लगातार मॉनीटरिंग को जाताा है। इसके लिए वेटरनिटी टीम को खास जिम्मेदारी सौंपी गई है। एक वेटरनिटी एक्सपर्ट करीब 25 नेबरहुड ग्रुप पर नजर रखता है। वह हर सदस्य के घर दो सप्ताह में एक बार जाकर देखरेख कर सकता है। इसके अलावा हर ग्रुप को चार दिन की ट्रेनिंग दी जाती है। ताकि बकरी उत्पादन को अधिक वैज्ञानिक तरीके से किया जा सके।
इस प्रोजेक्ट को महिलाएं अपने परिवार को संभालने के साथ ही मैनेज कर सकती हैं। क्योंकि इसमें पूरा समय लगाने की जरूरत नहीं होती है। ग्रुप की महिलाएं बकरियों को चराने के लिए बारी-बारी से जा सकती हैं। इससे सभी को आसानी रहेगी। अब, मैथली जो बकरी चराने में सक्षम नहीं थी वह दस ग्रुप को संभाल रही है। वह खुद भी चालीस बकरियों की देखरेख कर रही है।





 फंडा यह है कि...

किसी भी बिजनेस में सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह लोगों के जीवन से कितना जुड़ती है और उन्हें कितना बदलती है। जिस तरह 'गोट विलेज' स्कीम ने 1000 परिवारों की मदद की और उनका जीवन बदल डाला। 



Management Funda - N. Raghuraman


































Source: A Successful Business Depends On Changing Lives of People - Management Funda By N. Raghuraman - Dainik Bhaskar 22nd June 2014