Friday, October 11, 2013

बिजनेस के विस्तार के लिए ज़रूरी है लगातार रिसर्च - मैनेजमेंट फंडा - एन. रघुरामन - 11th October 2013

टी बोर्ड ऑफ इंडिया को यह पता था कि चाय को बेहद पसंद करने वाली देश की आबादी के लिए सुबह की चाय की कीमत बढ़ने वाली है। यदि लगातार शोध नहीं किया गया तो वह दिन दूर नहीं जब लोग सुबह की चाय पीना छोड़ देंगे या मॉर्निग ड्रिंक में कुछ और लेने लगेंगे। देश के हर इलाके में लोग चाय पीना पसंद करते हैं, लेकिन टी बोर्ड इस आशंका से सहमा हुआ था। यह चाय उद्योग के अस्तित्व के लिए खतरा हो सकता था। साल 2008 में उसने आईआईटी, खड़गपुर को नई तकनीकों से लैस ऐसी मशीन तैयार करने को कहा जिससे चाय उत्पादन की लागत काफी कम हो जाए। इसके लिए 3.66 करोड़ रुपए का फंड दिया। प्रोफेसर बिजॉयचंद्र घोष के नेतृत्व में आईआईटी, खड़गपुर के एग्रीकल्चर एंड फूड इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट के वैज्ञानिकों की टीम ने लगातार पांच साल की मेहनत के बाद उत्पादन की एक नई मिनी सीटीसी (क्रश, टिअर एंड कर्ल) विधि तैयार की है। इस साल अगस्त में नॉर्थ बंगाल रीजनल आर एंड डी सेंटर ने टी बोर्ड के विशेषज्ञों, वैज्ञानिकों और चाय उत्पादकों की मौजूदगी में इसके प्रोटोटाइप को मंजूरी दे दी। 


 Source: Management Funda By N Raghuraman - Dainik Bhaskar 11th October 2013

वैज्ञानिक चाय उत्पादन की परंपरागत विधि के हर पड़ाव पर जगह, एनर्जी और कुल लागत में कमी लाने में सफल रहे हैं। उन्होंने एक वृत्ताकार कंटेनर बनाया है जिसमें चाय की पत्तियां जमा की जा सकती हैं। इसमें 60 फीसदी तक जगह की जरूरत कम हो जाती है और ऊर्जा की खपत भी कम होती है। उनके बनाए नए मासरेटर की भी यही खासियत है। कुल मिलाकर शोधकर्ता नई मशीनों के उपयोग से चाय के उत्पादन की लागत कम करने में कामयाब रहे। चाय की गुणवत्ता को बनाए रखने में सबसे महत्वपूर्ण यह होता है कि हरी पत्तियों को सुखाने के लिए कितनी जल्दी भेजा जाता है। लेकिन अधिकांश बड़े और छोटे चाय उत्पादक ऐसा नहीं कर पाते और उन्हें अच्छी कीमत नहीं मिल पाती। नए मॉडल की खासियत यह है कि इसमें सुखाने के लिए मशीन साथ ही लगी हुई है। इससे पत्तियों को सुखाने के लिए कहीं भेजना नहीं पड़ता। इससे समय की बचत तो होती ही है, बगान से तोड़ी गई हरी चाय की पत्तियों की गुणवत्ता भी बरकरार रहती है। चाय के छोटे उत्पादकों को वैल्यू चेन में ऊपर लाने के लिए यह पहला कदम है। वे अब अपनी चाय खुद ही तैयार कर सकते हैं जो बड़े उत्पादकों के उत्पाद जितनी ही अच्छी होगी।

थोड़ी जुगत लगाकर वे इसकी अच्छी कीमत भी हासिल कर पाएंगे। इससे पहले एक परंपरागत टी प्रोसेसिंग यूनिट को लगाने में करीब 25 करोड़ रुपए का खर्च आता था। इसे चलाने के लिए भी 20 से 25 लोगों की जरूरत होती थी। लेकिन नए मॉडल को लगाने में बमुश्किल 25 लाख रुपए की लागत आएगी और इसमें 1000 से 3000 किलोग्राम ताजी चाय की रोजाना प्रोसेसिंग हो पाएगी। इसे चलाने के लिए भी केवल तीन से चार लोगों की जरूरत होती है। नई मशीनों से चाय की हर प्याली में अनोखी ताजगी का अहसास मिलेगा। यह चाय पीने वालों के लिए तो खुशखबरी है ही, चाय के छोटे उत्पादकों के लिए भी अच्छी बात है क्योंकि वे अब बड़े उत्पादकों से समानता के स्तर पर मुकाबला कर सकेंगे। टोयोटा जैसी कार निर्माता कंपनी को जब यह लगने लगता है कि किसी खास मॉडल की बिक्री आने वाले महीनों में नहीं बढ़ने वाली है तो वह अपने एसेसरीज सप्लायर को लागत कम करने को कहती है। दुनिया भर में कंपनी के 200 से ज्यादा एसेसरीज सप्लायर हैं और उन्हें एक निश्चित सीमा तक लागत कम करनी पड़ती है। इससे सप्लायर रिसर्च के लिए मजबूर होते हैं, लेकिन यह खुद उनके और कार निर्माता कंपनी की माली हालत को मजबूत बनाए रखता है।

 फंडा यह है कि..


बिजनेस चाहे कैसा भी क्यों न हो, उसे बेहतर बनाए रखने के लिए लगातार शोध जरूरी है। इससे कारोबार में बढ़ोतरी को लेकर आत्मसंतुष्टि की भावना को नियंत्रित रखने में मदद मिलती है।


 

















 Source: Management Funda By N Raghuraman - Dainik Bhaskar 11th October 2013