Thursday, October 31, 2013

Wiseman Judges Truth Before Taking Decisions - Management Funda - N Raghuraman - 31st October 2013

बुद्धिमान फैसला लेने से पहले सच देखते हैं..

मैनेजमेंट फंडा - एन. रघुरामन



चेन्नई की साउथ इंडिया पेट्रो केमिकल्स में ह्यूमन रिसोर्स डायरेक्टर हैं आर. नारायणन। उन्हें ऐसे व्यक्ति के तौर पर जाना जाता है जो कभी बकवास नहीं करते। यहां तक कि उनसे उनकी सेकेट्ररी अगर दीपावली के मौके पर घर में दिए जलाने के लिए दो घंटे की छुट्टी मांगे तो वे नहीं देते। लोग उन्हें नियम-कायदों का सख्ती से पालन करने वाले के तौर पर जानते हैं। और जब किसी कर्मचारी की जरूरत का मामला हो तो वे उसकी मदद के लिए एक महान व्यक्ति के तौर पर भी सामने आते हैं। वे मैनेजमेंट के सबसे विश्वासपात्र व्यक्ति हैं। और पिछले आठ साल से इस पद पर हैं।नारायणन की सेक्रेटरी का नाम कल्पना है। सात महीने की गर्भवती है। इसके बावजूद वे उसे हर पांच मिनट में कोई न कोई फाइल लेकर आने के लिए आवाज देते हैं। 

Source: Management Funda By N Raghuraman - Dainik Bhaskar 31st October 2013
वह भी अपनी टेबिल से कभी उनके केबिन तो कभी बोर्ड रूम को दौड़ती रहती है। उस रोज भी उन्होंने कल्पना को कोई फाइल लाने के लिए आवाज दी थी। वह भी खुशी-खुशी फाइल लेकर उनके केबिन की तरफ लपकी। लेकिन ऑफिस के दूसरे लोगों को बॉस का यह रवैया रास नहीं आया। कल्पना को मुफ्त सलाह मिलने लगी। ‘कल्पना संभल के’, ‘आराम से जाओ’, ‘धीरे चलो’, ‘सावधानी बरतो’ वगैरह-वगैरह। ऑफिस का चपरासी अपने साथी के साथ दूर खड़ा सुपारी खा रहा था। वह भी बुदबुदाया, ‘यह आदमी (बॉस नारायणन) कभी नहीं सुधर सकता। इसके बच्चे तो हैं नहीं। इसे क्या पता किसी औरत के गर्भवती होने का क्या मतलब है।’ दूसरे चपरासी ने हां में हां मिलाई।

इन दोनों की बातें एक सीनियर मैनेजर भी सुन रहा था। उसने अपने साथी से इन बातों पर सहमति जताते हुए कहा, ‘बड़े अफसोस की बात है। जो बात हमारे चपरासी तक समझते हैं उसे हमारा एचआर डायरेक्टर नहीं समझ पा रहा है।’ ऑफिस में जब यह सुगबुगाहट हो रही थी तब इस पर किसी का ध्यान ही नहीं गया कि नारायणन और कल्पना केबिन से बाहर आ चुके हैं। उन्होंने सब बातें सुन ली हैं। नारायणन अपने केबिन में लौट चुके थे। पहुंचते ही सबसे पहले उन्होंने कमेंट पास करने वाले सीनियर मैनेजर को तलब किया। उससे कहा, ‘कभी भी पूरी कहानी, पूरा सच जाने बिना कोई फैसला न किया करें।’ नारायणन ने अपनी कहानी कहना शुरू की, ‘जब मेरी मां दूसरी बार गर्भवती हुई तो मेरे पिता उनका बहुत ख्याल रखते थे। वे उन्हें कोई काम नहीं करने देते। यहां तक कि उन्होंने उस वक्त मुझे चाय बनानी सिखा दी। तब मैं सिर्फ आठ साल का था।’ इतना कहते-कहते नारायणन की आवाज कंपकंपाने लगी।

उन्होंने साहस बटोरा और आगे बोले, ‘इस पूरी देखभाल के बावजूद मेरी मां छोटे भाई को जन्म देते ही चल बसी। डॉक्टरों ने बताया कि जब वे गर्भवती थीं तो बिल्कुल भी चली-फिरी नहीं। इसलिए कई तरह की जटिलताएं पैदा हो गई थीं। सिर्फ मैं ही जानता हूं कि मैंने किस तरह अपने पिता के साथ मिलकर अपने छोटे भाई को पाला है। ..तीन महीने पहले मैं कल्पना के पति से मिला था। मैंने देखा कि उनकी आदत भी बिल्कुल मेरे पिता की तरह ही है। वे भी कल्पना को बिल्कुल चलने-फिरने नहीं देते। कोई काम नहीं करने देते। इसीलिए मैं कल्पना को बार-बार बुलाता रहता हूं। ताकि इसी बहाने वह कुछ चले-फिरे। जितना ज्यादा से ज्यादा संभव हो, ऑफिस में उसकी एक्सरसाइज हो जाए।’ नारायणन की कहानी खत्म हो चुकी थी। लेकिन सामने बैठे सीनियर मैनेजर अवाक थे। शायद उन्होंने सपने में भी इस सच के बारे में सोचा नहीं था।


फंडा यह है कि..

ग्रीक दार्शनिक फाइरो ने कहा है, ‘बुद्धिमान हमेशा अपने फैसले को कुछ देर के लिए रोक कर रखते हैं। वे कभी नहीं कहते है कि ऐसा है। इसके बजाय वे कहते हैं कि ऐसा लगता है।’












Source: Management Funda By N Raghuraman - Dainik Bhaskar 31st October 2013