Wednesday, October 9, 2013

Economy Will Regain Its Power By Nature - Management Funda - N Raghuraman - 9th October 2013

इकॉनोमी को रफ़्तार प्रकृति से मिलेगी

मैनेजमेंट फंडा - एन रघुरामन 

 केरल और तमिलनाडु दो ऐसे राज्य हैं जहां देश में सबसे ज्यादा नारियल की खपत होती है। यहां नारियल का कचरा भी खूब होता है। कुछ जगहों पर इसे जला दिया जाता है, लेकिन इससे वातावरण में ऑक्सीजन घटने लगती है। इन दोनों राज्यों के नगरीय निकायों के लिए इसका प्रबंधन एक बड़ा मुद्दा है। अब तक नारियल की जटाओं से कोई ने कोई उत्पाद बनाने का ही इकलौता रास्ता रहा है। इससे लोग पैसे भी कमा लेते हैं, लेकिन यह समस्या के समाधान के लिए काफी नहीं है। इसे देखते हुए तमिलनाडु के त्रिची में स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एनआईटी) ने प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के साथ मिलकर एक रास्ता निकाला है। नारियल की जटाओं से बनने वाले जूट को सड़क निर्माण में इस्तेमाल करने का। तमिलनाडु के सात जिलों में कई सड़कें तो इसके जरिए बनाई भी जा चुकी हैं। एनआईटी के मुताबिक, नारियल के जूट से बनी सड़कें मजबूत होती हैं।

इससे नगरीय निकायों का सड़कों के रखरखाव में होने वाला खर्च भी बचता है। बड़े पैमाने पर जूट से सड़कों का निर्माण शुरू हो, इससे पहले एनआईटी त्रिची ने इसका सफल परीक्षण किया था। सड़क बनाने के लिए जूट के साथ बजरी और डामर का इस्तेमाल किया गया। परीक्षण सफल रहे तो केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय ने भी इस तरह की सड़कों के निर्माण की योजना को हरी झंडी देने में देर नहीं की। याद दिला दें कि इन दोनों राज्यों ने नारियल की जटाओं की तरह ही जलकुंभी की समस्या का भी बेहतर समाधान खोजा था। जलकुंभी के जरिए आजकल वहां शानदार हस्तशिल्प उत्पाद बनाए जा रहे हैं। अब पंजाब में भी जलकुंभी से हस्तशिल्प का काम शुरू हो चुका है।

Source: Management Funda By N Raghuraman - Dainik Bhaskar 9th October 2013


नायलॉन की रस्सियों के बढ़ते इस्तेमाल ने जूट की मांग को काफी कम कर दिया है। इसके बाद जूट के उत्पादक किसी विकल्प की तलाश में थे। उन्हें विकल्प मिला एनआईटी के नए प्रोजेक्ट के जरिए। अब सड़कों के निर्माण में पहले जूट को बजरी के साथ मिलाकर बिछाया जाता है। इसके बाद उस पर डामर की परत डाली जाती है। जूट डामर की सतह की पूरी नमी सोख लेता है। इससे सड़क उखड़ नहीं पाती। इस पूरी प्रक्रिया के लिए किसी बड़े कौशल की जरूरत नहीं होती। आम मजदूर भी यह काम कर सकते हैं। यही नहीं यह सड़क उस क्षेत्र के लिए भी कारगर है, जहां मिट्टी में चिकनाहट ज्यादा होती है। जूट की सड़क पांच से छह साल तक टिकती है। इसे एनआईटी ने साबित किया है। जूट की सड़क बनाने वाला केरल देश का पहला राज्य है। जब यहां इस तरह की करीब 700 किलोमीटर लंबी सड़क बनाने में काम में सफलता मिली तो तमिलनाडु ने भी इसको अपनाया। कोयंबटूर, धर्मापुरी, डिंडीगुल, कृष्णागिरि, तिरुपुर, त्रिची और रामनाथपुरम में इस तरह की सड़कें बनाई जा रही हैं। इन सड़कों की लागत ज्यादा होती है। लेकिन इनकी उम्र ज्यादा होती है इसलिए इससे अधिक फर्क नहीं पड़ता।

दोनों राज्यों में इस परियोजना की सफलता को देखते हुए केंद्र ने अन्य राज्यों को भी इसे अपनाने की सलाह दी है। इसके बाद छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा जैसे राज्यों ने पहल भी शुरू कर दी है। इन राज्यों ने अपने अधिकारियों को परियोजना के अध्ययन के लिए तमिलनाडु और केरल भेजा है। इन दोनों राज्यों में आजकल एक और दिलचस्प चीज देखने में आ रही है। जिस तरह कई अन्य राज्यों में लोगों को सड़कों के किनारे से प्लास्टिक बीनते हुए देखा जाता है वैसे ही तमिलनाडु-केरल में अब लोग नारियल के जटा-जूट बीनते हुए दिख जाते हैं ताकि वे उसे बेचकर कमाई कर सकें। प्रकृति की ताकत और क्षमता का यह छोटा सा उदाहरण है।


फंडा यह है कि..

प्रकृति में ऐसा बहुत कुछ है जिसे कच्चे माल की तरह इस्तेमाल कर अच्छे उत्पाद बनाए जा सकते हैं। जिसे हम कचरा मान लेते हैं, वह भी काम आ सकता है और इससे अर्थव्यवस्था को भी ईंधन मिल सकता है।






















Source: Management Funda By N Raghuraman - Dainik Bhaskar 9th October 2013