Thursday, November 21, 2013

Garbage is not always a Garbage - Management Funda - N Raghuraman - 21st November 2013

कचरा कभी कचरा नहीं होता

मैनेजमेंट फंडा - एन. रघुरामन


मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले में एक जगह है पिपरिया। देश-विदेश में विख्यात पर्यटक केंद्र पचमढ़ी जाना हो तो पिपरिया आखिरी स्टेशन होता है। यह कहानी इसी कस्बे से जुड़ी है। आईआईटी कानपुर से पासआउट और पेशे से इंजीनियर अरविंद गुप्ता अपने एक दोस्त के साथ पिपरिया के साप्ताहिक हाट में घूम रहे थे। यह 1980 के दशक की बात है। दोनों दोस्तों में चर्चा चल रही थी आखिर इस इलाके के पिछड़ेपन के क्या कारण हैं। खासकर विज्ञान के विषय में तो यह क्षेत्र बेहद पिछड़ा ही है और भी कई कारणों पर बात हुई। इनमें से एक निकला कि पढ़ाई-लिखाई के तरीकों में नए प्रयोग नहीं किए जाते। इसी बातचीत के दौरान अरविंद के दिमाग में एक आइडिया आया कि वे कोई तरीका इजाद क्यूं नहीं कर सकते, जिससे विज्ञान की पढ़ाई आसान हो जाए, जिससे शिक्षकों को भी विज्ञान आसान तरीके से पढ़ाने का रास्ता मिल जाए। शिक्षकों-छात्रों को विज्ञान विषय पढ़ाने-पढऩे में मजा आने लगे। अरविंद तुरंत एक दुकान पर गए। वहां से कुछ सामान खरीदा और उससे खिलौने बनाने शुरू कर दिए। वे सामान्य खिलौने नहीं थे, बल्कि विज्ञान की पढ़ाई से जुड़े खिलौने थे। बेकार समझी जा चुकी चीजों से ये खिलौने बने थे। आज तीन दशक हो चुके हैं। लोग अरविंद को, जो पहले टेल्को की ट्रक निर्माण इकाई में काम करते थे, अब विज्ञान से जुड़े खिलौने बनाने वाले के तौर पर जानते हैं। सिर्फ एक खास इलाके में नहीं, अरविंद के ईजाद किए नए तरीके ने पूरी दुनिया में बच्चों के विज्ञान की शिक्षा को आसान बना दिया है। उसके बाद खुद अरविंद सोचने लगे हैं कि ये खिलौने बनाना ट्रक बनाने से ज्यादा बेहतर है। यही नहीं उन्होंने अपने बनाए इन खिलौनों को अपने दम पर देश के कोने-कोने तक पहुंचाया। क्या गांव, क्या शहर, क्या आदिवासी और क्या अन्य लोग। हर जगह। 
 
Source: Garbage is not always a Garbage - Management Funda By N Raghuraman - Dainik Bhaskar 21st November 2013
पुणे में अरविंद का ऑफिस 500 वर्गफीट से ज्यादा नहीं होगा। उनकी उम्र भी अब 60 के आसपास हो चुकी है, लेकिन उनके डिजाइन किए हुए विज्ञान खिलौनों की चमक बिल्कुल कम नहीं हुई है। पूरे देश में जो काम विज्ञान की किताबें नहीं कर पा रही हैं, वह ये खिलौने कर रहे हैं। वह भी बेहद प्रभावी तरीके से। अब खुद अरविंद भी मानने लगे हैं कि ट्रक डिजाइन करने से बेहतर तो ये खिलौने डिजाइन करना है और ये खिलौने भी कैसे बनाए जाते हैं? माचिस की काडिय़ों और रबर ट्यूब के जरिए। उनसे ज्यॉमेट्रिकल (ज्यामितीय) आकृतियां बनाना सिखाया जाता है। पीने की नलियों के मार्फत ऊपर की ओर से लगाई जाने वाली फोर्स (ताकत) के बारे में बताया जाता है। साइकिल के ट्यूब से बताया जाता है कि पंप कैसे काम करता है। इस सबके जरिए अरविंद ने दिखाया है और साबित भी किया है कि किसी भी चीज के जरिए विज्ञान को मजेदार बनाया जा सकता है। अरविंद के मन में आदिवासी बच्चों के लिए कुछ करने का बीज काफी पहले पड़ गया था। 
 
आईआईटी कानपुर के शिक्षकों ने गरीब बच्चों के लिए 'अपॉर्चुनिटी स्कूल' संचालित किया था। उस वक्त अरविंद भी आईआईटी कानपुर में पढ़ रहे थे। उन्होंने भी इस कार्यक्रम में हिस्सा लिया। वे और उनके दोस्त सप्ताह में एक बार अपनी क्लास छोड़कर यहां पढ़ाया करते थे। यहीं से उन्होंने इस दिशा में आगे बढऩे का मन बना लिया था। पिपरिया की साप्ताहिक हाट में दोस्त के साथ हुई बातचीत के दौरान यह निर्णय पक्का हो गया। और वहीं से अरविंद के जीवन की दिशा पूरी तरह बदल गई। अरविंद जब छोटे थे, तभी से कुछ न कुछ नया करने की छटपटाहट उनमें नजर आती थी। उनके नजदीकी लोग बताते हैं कि वे छुटपन में अक्सर चीजों को छिन्न-भिन्न कर उन्हें फिर जोडऩे में लगे रहते थे। उनकी मां में बहुत धीरज था। वे अरविंद को यह सब करने से कभी रोकती नहीं थीं। उस समय उनका सबसे अच्छा दोस्त एक बॉक्स हुआ करता था। इसमें पेंच-पेंचकस और इसी तरह के दूसरे औजार रखे रहते थे। तब उनकी उम्र यही कोई आठ साल रही होगी। उन्होंने अपने घर के सीलिंग फैन को ही रिपेयरिंग के लिए खोल डाला। उसे सुधार भी दिया। 
 
मूलत: उत्तरप्रदेश के रहने वाले अरविंद ट्रांसलेशन में भी उतने ही माहिर हैं। वे किसी जुनूनी की तरह अंग्रेजी से हिंदी में अहम किताबों का अनुवाद करते हैं। अब तक करीब 155 किताबों का अनुवाद कर चुके हैं। यह इसलिए क्योंकि वे जानते हैं कि हिंदी में पढऩे-लिखने की अच्छी सामग्री आज भी उपलब्ध नहीं है। उन्होंने 23 किताबें लिखी भी हैं। जिन किताबों का उन्होंने अनुवाद किया और जिन्हें लिखा, वे सब उनकी वेबसाइट पर उपलब्ध हैं। ज्यादातर मुफ्त में डाउनलोड की जा सकती हैं। उनकी लिखी कई किताबें तो छपने स पहले ही वेबसाइट पर आ जाती हैं। पुणे के इंटर यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर एस्ट्रोनॉमी एंड एस्ट्रोफिजिक्स में काम करते हुए अरविंद को तीन साल हुए हैं। उन्हें यहां सेंटर के एस्ट्रोफिजिसिस्ट जयंत नार्लीकर ने बुलाया था। लेकिन यहां भी अरविंद और उनकी चार सदस्यीय टीम बच्चों के दिल में विज्ञान के प्रति प्रेम के बीज डालने में ही लगी है।

मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले में एक जगह है पिपरिया। देश-विदेश में विख्यात पर्यटक केंद्र पचमढ़ी जाना हो तो पिपरिया आखिरी स्टेशन होता है। यह कहानी इसी कस्बे से जुड़ी है। आईआईटी कानपुर से पासआउट और पेशे से इंजीनियर अरविंद गुप्ता अपने एक दोस्त के साथ पिपरिया के साप्ताहिक हाट में घूम रहे थे। यह 1980 के दशक की बात है। दोनों दोस्तों में चर्चा चल रही थी आखिर इस इलाके के पिछड़ेपन के क्या कारण हैं। खासकर विज्ञान के विषय में तो यह क्षेत्र बेहद पिछड़ा ही है और भी कई कारणों पर बात हुई।

इनमें से एक निकला कि पढ़ाई-लिखाई के तरीकों में नए प्रयोग नहीं किए जाते। इसी बातचीत के दौरान अरविंद के दिमाग में एक आइडिया आया कि वे कोई तरीका इजाद क्यूं नहीं कर सकते, जिससे विज्ञान की पढ़ाई आसान हो जाए, जिससे शिक्षकों को भी विज्ञान आसान तरीके से पढ़ाने का रास्ता मिल जाए। शिक्षकों-छात्रों को विज्ञान विषय पढ़ाने-पढऩे में मजा आने लगे। अरविंद तुरंत एक दुकान पर गए। वहां से कुछ सामान खरीदा और उससे खिलौने बनाने शुरू कर दिए। वे सामान्य खिलौने नहीं थे, बल्कि विज्ञान की पढ़ाई से जुड़े खिलौने थे। बेकार समझी जा चुकी चीजों से ये खिलौने बने थे। आज तीन दशक हो चुके हैं। लोग अरविंद को, जो पहले टेल्को की ट्रक निर्माण इकाई में काम करते थे, अब विज्ञान से जुड़े खिलौने बनाने वाले के तौर पर जानते हैं। सिर्फ एक खास इलाके में नहीं, अरविंद के ईजाद किए नए तरीके ने पूरी दुनिया में बच्चों के विज्ञान की शिक्षा को आसान बना दिया है। उसके बाद खुद अरविंद सोचने लगे हैं कि ये खिलौने बनाना ट्रक बनाने से ज्यादा बेहतर है। यही नहीं उन्होंने अपने बनाए इन खिलौनों को अपने दम पर देश के कोने-कोने तक पहुंचाया। क्या गांव, क्या शहर, क्या आदिवासी और क्या अन्य लोग। हर जगह। पुणे में अरविंद का ऑफिस 500 वर्गफीट से ज्यादा नहीं होगा। उनकी उम्र भी अब 60 के आसपास हो चुकी है, लेकिन उनके डिजाइन किए हुए विज्ञान खिलौनों की चमक बिल्कुल कम नहीं हुई है। पूरे देश में जो काम विज्ञान की किताबें नहीं कर पा रही हैं, वह ये खिलौने कर रहे हैं। वह भी बेहद प्रभावी तरीके से। अब खुद अरविंद भी मानने लगे हैं कि ट्रक डिजाइन करने से बेहतर तो ये खिलौने डिजाइन करना है और ये खिलौने भी कैसे बनाए जाते हैं? माचिस की काडिय़ों और रबर ट्यूब के जरिए। उनसे ज्यॉमेट्रिकल (ज्यामितीय) आकृतियां बनाना सिखाया जाता है। पीने की नलियों के मार्फत ऊपर की ओर से लगाई जाने वाली फोर्स (ताकत) के बारे में बताया जाता है। साइकिल के ट्यूब से बताया जाता है कि पंप कैसे काम करता है। इस सबके जरिए अरविंद ने दिखाया है और साबित भी किया है कि किसी भी चीज के जरिए विज्ञान को मजेदार बनाया जा सकता है। अरविंद के मन में आदिवासी बच्चों के लिए कुछ करने का बीज काफी पहले पड़ गया था। आईआईटी कानपुर के शिक्षकों ने गरीब बच्चों के लिए 'अपॉर्चुनिटी स्कूल' संचालित किया था। 
 
उस वक्त अरविंद भी आईआईटी कानपुर में पढ़ रहे थे। उन्होंने भी इस कार्यक्रम में हिस्सा लिया। वे और उनके दोस्त सप्ताह में एक बार अपनी क्लास छोड़कर यहां पढ़ाया करते थे। यहीं से उन्होंने इस दिशा में आगे बढऩे का मन बना लिया था। पिपरिया की साप्ताहिक हाट में दोस्त के साथ हुई बातचीत के दौरान यह निर्णय पक्का हो गया। और वहीं से अरविंद के जीवन की दिशा पूरी तरह बदल गई। अरविंद जब छोटे थे, तभी से कुछ न कुछ नया करने की छटपटाहट उनमें नजर आती थी। उनके नजदीकी लोग बताते हैं कि वे छुटपन में अक्सर चीजों को छिन्न-भिन्न कर उन्हें फिर जोडऩे में लगे रहते थे। उनकी मां में बहुत धीरज था। वे अरविंद को यह सब करने से कभी रोकती नहीं थीं। उस समय उनका सबसे अच्छा दोस्त एक बॉक्स हुआ करता था। इसमें पेंच-पेंचकस और इसी तरह के दूसरे औजार रखे रहते थे। तब उनकी उम्र यही कोई आठ साल रही होगी। उन्होंने अपने घर के सीलिंग फैन को ही रिपेयरिंग के लिए खोल डाला। उसे सुधार भी दिया। मूलत: उत्तरप्रदेश के रहने वाले अरविंद ट्रांसलेशन में भी उतने ही माहिर हैं। वे किसी जुनूनी की तरह अंग्रेजी से हिंदी में अहम किताबों का अनुवाद करते हैं। अब तक करीब 155 किताबों का अनुवाद कर चुके हैं। यह इसलिए क्योंकि वे जानते हैं कि हिंदी में पढऩे-लिखने की अच्छी सामग्री आज भी उपलब्ध नहीं है। उन्होंने 23 किताबें लिखी भी हैं। जिन किताबों का उन्होंने अनुवाद किया और जिन्हे लिखा, वे सब उनकी वेबसाइट पर उपलब्ध है। ज़्यादातर मुफ्त में डाउनलोड की जा सकती है। उनकी लिखी कई किताबें तो छपने से पहले ही वेबसाइट पर आ जाती है। पुणे के इंटर यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर एस्ट्रॉनॉमी एंड ऐस्ट्रोफिसिकस में काम करते हुए अरविन्द को तीन साल हुए हैं। उन्हें यहाँ सेंटर के ऐस्ट्रोफिजिसिस्ट जयंत नार्लीकर ने बुलाया था। लेकिन यहाँ भी अरविन्द और उनकी चार सदस्यीय टीम, बच्चों के दिल में विज्ञान के प्रति प्रेम के बीज डालने में ही लगी है। 
 

फंडा यह है कि …

अगर आप कचरे को कचरे की नज़र से देखते हैं तो ये कचरा है। लेकिन इसमें भी कोई सम्भावना दिखने लगे तो दुनिया ही दूसरी नज़र आयेगी।  

 
 
     


















Source: Garbage is not always a Garbage - Management Funda By N Raghuraman - Dainik Bhaskar 21st November 2013