Tuesday, November 26, 2013

If Relations Between Past and Future Are Good Then Present Will Be Better - Management Funda - N Raghuraman - 26th November 2013

अतीत और भविष्य के संबंध अच्छे हों तो वर्तमान बेहतर होगा 

 मैनेजमेंट फंडा - एन. रघुरामन


पुणे के तंबात समुदाय से ताल्लुक रखते हैं बालचंद्र काडू। तांबे के बर्तन बनाते हैं। शहर के कस्बा पेठ इलाके में उनकी वर्कशॉप है। वे अपने समुदाय की सातवीं पीढ़ी हैं। करीब 400 साल पहले यह समुदाय पुणे और आस-पास के इलाके में आकर बसा था। पहले यह पेशवा शासकों के लिए हथियार वगैरह बनाता था। अब तांबे के बर्तन, कलाकृतियां बनाकर जीविका चला रहा है। एक साल पहले की बात है। बालचंद्र अपनी वर्कशॉप में तांबे की थाली बना रहे थे। उन्होंने उसे हर तरफ से देखा। सब कुछ ठीक पाकर उन्हें अपने काम पर संतुष्टि और खुशी हुई। लेकिन दुख के दो कारण भी थे। पहला यह कि 14 घंटे आग के सामने बैठकर बनाई शानदार कलाकृति के सिर्फ दो-तीन सौ रुपए ही मिलने थे। दूसरा, उनके बच्चे ने इस काम में हाथ बंटाने से साफ इनकार कर दिया था। उनके लड़के ने ह्यूमन रिसोर्स मैनेजमेंट में करिअर चुना है। यह कहानी सिर्फ बालचंद्र की है, ऐसा नहीं है। पूरे तंबात समुदाय में ऐसे ही किस्से हैं। नई पीढ़ी अपना परंपरागत काम छोड़कर वह करिअर चुन रही है जहां ज्यादा पैसे मिलें। 
 
स्रोत : If Relations Between Past and Future Are Good Then Present Will Be Better - Management Funda By N Raghuraman - दैनिक भास्कर 26th November 2013   

तांबे की चादर को पीटने की कला को मत्थर कहते हैं। यह अद्वितीय है और तंबात समुदाय के अलावा शायद ही इसमें कोई माहिर हो। अपनी इसी विशेषज्ञता के जरिए ये लोग सालों-साल से तांबे के बर्तन और कलाकृतियां बनाते रहे हैं। इसी से जीविका भी चलती रही लेकिन हालात बदल रहे हैं। लोगों ने तांबे के बर्तनों का इस्तेमाल बंद कर दिया है। अन्य कलाकृतियों का उपयोग भी सीमित हो गया है। जो बिकती और खरीदी जाती हैं, बहुत कम कीमत पर। इसमें भी ज्यादातर पैसा बिचौलियों की जेब में चला जाता है। मूल कलाकारों को उनकी कला के एवज में न के बराबर पैसा मिलता है। हस्तशिल्प के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसे बड़ी मात्रा में नहीं बनाया जा सकता। दूसरी यह कि लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि हाथ से बनी कलाकृतियों में पूरी कीमत कलाकार की कला की होती है। उन्हें सही कीमत मिलनी ही चाहिए। यही उनका सम्मान भी है। बहरहाल। इन दिक्कतों से जूझ रहे तंबात समुदाय की मदद के लिए शुभदा कमलापुरकर जैसे कुछ लोग आगे आए हैं। वे कंजरवेशन आर्किटेक्ट हैं। इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हैरिटेज (इनटैक) नामक संगठन की सदस्य भी।

इनटैक हस्तशिल्प बनाने वालों को सीधे ऐसे लोगों तक पहुंचाने में मदद करता है जो हस्तकला की कद्र करते हैं। संगठन कलाकारों को बताता है उन्हें उनकी कला की सही कीमत और प्रशंसा कहां मिल सकती है। संगठन ने हस्तशिल्प उत्पादों की प्रदर्शनियां लगानी शुरू की हैं। उन्हें बड़े होटलों और ऐसे ही अन्य स्थानों में सप्लाई करना भी शुरू किया है। हाल में इनटैक की ओर से दिल्ली में ऐसी ही प्रदर्शनी 'दस्तकार' लगाई गई। इसमें तंबात समुदाय की बनाई कलाकृतियां प्रमुखता से प्रदर्शित की गईं। इनटैक ने सोशल मीडिया का इस्तेमाल भी शुरू किया है ताकि ज्यादा लोगों तक पहुंच हो सके। मार्च 2012 में एक फेसबुक पेज 'कॉपर्स' (Coppre's) शुरू किया गया जिसके फॉलोअर्स 1,765 हो चुके हैं। सोशल मीडिया हस्तशिल्प कलाकारों को अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाने में मददगार साबित हो रहा है। लोग खुद भी कलाकारों तक पहुंच रहे हैं।

कॉपर्स फेसबुक पेज पर विदेशी रिटेल स्टोर्स से भी पड़ताल आ रही है। जिन देशों में इस पेज को लेकर ज्यादा उत्सुकता है, उनमें सिंगापुर, ब्रिटेन, दुबई, फिनलैंड और स्वीडन प्रमुख हैं। हर महीने करीब 20 लोग इस पेज पर पूछ-परख करते हैं। त्योहारी सीजन में संख्या 50 तक पहुंच जाती है। इनमें से पांच से 15 लोग हस्तशिल्प उत्पादों के ऑर्डर भी दे देते हैं। ये ऑर्डर 1,500 से 75,000 रुपए तक होतेे हैं। फेसबुक पेज ने न सिर्फ तांबे की कृतियों की ब्रांड वैल्यू बढ़ाई है बल्कि लोगों को जागरूक किया है। बालचंद्र के पास इन दिनों अपने उत्पादों के लिए खूब ऑर्डर हैं। लेकिन माहिर कलाकारों की संख्या सिर्फ 17 रह गई है। उनकी कोशिश है कि अपने समुदाय के ज्यादा से ज्यादा लोगों को इस काम में वापस लाएं। कोशिश कामयाब होने की संभावना है क्योंकि तंबात कारीगरों को रोज छह से सात सौ रुपए मिल रहे हैं और भविष्य भी ज्यादा चमकदार नजर आ रहा है।

फंडा यह है कि …… 

संचार और मार्केटिंग परंपरागत कला व कलाकारों को बड़ा बाजार मुहैया करा सकते हैं। बस बीते और आने वाले के बीच संबंध अच्छे हों। पुराना नई तकनीक अपनाए और नया पुराने को संरक्षण दे।


































स्रोत : If Relations Between Past and Future Are Good Then Present Will Be Better - Management Funda By N Raghuraman - दैनिक भास्कर 26th November 2013