Wednesday, January 8, 2014

Market of Nudity and Greed for Market - Parde Ke Peeche - Jaiprakash Chouksey - 8th January 2014

नग्नता का बाजार और बाजार का लोभ

परदे के पीछे - जयप्रकाश चौकसे


आमिर खान और राजकुमार हीरानी की 'पी.के.' में आमिर खान ने एक शॉट निर्वस्त्र होकर दिया है और प्रचार तंत्र इसे फिल्म की एक महत्वपूर्ण घटना बता रहा है मानो पूरा हिन्दुस्तान आमिर खान को नग्न अवस्था में देखने के लिए बेचैन है। यह कितनी अजीब बात है कि तमाम शिखर नायिकाएं न्यूनतम वस्त्रों में अधिकतम समय परदे पर नजर आती हैं, यहां तक कि बर्फ से ढके लोकेशन पर पुरुष तीन पीस का सूट पहने हैं परंतु नायिका को ठंड नहीं लगती, और नायक के शरीर प्रदर्शन को सनसनीखेज माना जा रहा है। लोगों की सोच का आलम यह है कि जब नील नितिन मुकेश या राहुल बोस इस तरह के दृश्य कर चुके हैं तो कोई विशेष प्रचार नहीं हुआ और ना ही वे फिल्में सफल रहीं परंतु शिखर सितारे को छींक आ जाये या वह निर्वस्त्र प्रस्तुत हो रहा हो तो बॉक्स ऑफिस पर सिक्कों की बौछार होगी और कुछ सिक्के सिनेमाघर के परदे तक भी पहुंचेंगे। आम दर्शक किस तरह सितारा ग्रसित हो चुका है कि वह तमाम गैर महत्वपूर्ण बातों को खूब तूल देता है। राजकुमार हीरानी की विगत तीनों फिल्में सामाजिक सोद्देश्यता के साथ मनोरंजन करती थीं और यह बात ही फिल्म देखने के लिए उत्सुकता को जन्म देती है तथा आमिर ने विगत पूरे दशक बहुत सोच समझकर फिल्में चुनीं हैं, अत: उनकी फिल्में बिना किसी प्रचार के भी देखने की उत्सुकता होती है। दरअसल इससे भी अधिक चिंता की बात यह है कि हम गैर जरूरी चीजें खरीदते है और राजनीति में भी अनावश्यक एवं मूर्खतापूर्ण बातें हमें उत्तेजित करती हैं।

Source: Market of Nudity and Greed for Market - Parde Ke Peeche By Jaiprakash Chouksey - Dainik Bhaskar 8th January 2014  

यह बात भी चिंतनीय है कि सदियों से हमारी लम्पटता अनेक ढंग से अभिव्यक्त होती रही है और नारी पुरुष में हमने इतना गहरा अंतर पैदा कर दिया है, दोनों के लिए दो मानदंड भी रच लिए हैं। नारी के शरीर प्रदर्शन पर लार टपकती है और इसे हमने अपना जन्मसिद्ध अधिकार भी बना लिया है। इस दूषित दृष्टिकोण की जड़ें बहुत गहरी है और हम में यह साहस भी नहीं है कि हम इसकी निष्पक्ष जांच-पड़ताल कर सकें। हुड़दंगी ये कभी नहीं होने देंगे। तटस्थता से विचार करने को हमने रोक दिया है। मीडिया भी पूरी तरह सनसनी आधारित है। उसे तथ्य या सत्य के प्रति कोई आग्रह नहीं है।

यह बात भारत तक सीमित नहीं है, हॉलीवुड की फिल्मों में भी नायक और नायिका के वस्त्र पहनने या नहीं पहनने को दो मानदंड है। वहां 'फुल मोंटी' जैसी फिल्में भी बनी है जिसमें आर्थिक मंदी के दौर ने पुरुषों को बाध्य किया कि वे क्लब में निर्वस्त्र प्रस्तुत हों। इस नग्नता को निर्देशक ने आर्थिक मंदी से जोड़कर कमाल का काम किया है। दरअसल असली मानवीय चिंता तो यह होना चाहिए कि आर्थिक अभाव के कारण कितने लोग लगभग पूरा जीवन कमोबेश नग्नता के लिए बाध्य हैं। जब आदिवासी क्षेत्रों में वहां की धरती में छुपे बहुमूल्य मिनरल्स के लिए 'सभ्यता' ने प्रवेश किया तो कुछ औरतों ने तन ढांकना प्रारंभ किया और वहां के बुजुर्गों को आश्चर्य हुआ तथा इसे सभ्यता का आक्रमण वैसे ही माना गया जैसे हमारी लिजलिजी मान्यताओं के टूटने को पश्चिम संस्कृति के आक्रमण की तरह प्रचारित किया जाता है।

मनोरंजन क्षेत्र हो या राजनीति हो, हमारा दृष्टिकोण ही बचकाना है और इस घोर अज्ञान को मासूमियत कहना भी अनुचित है। दरअसल हमारा भीतरी खोखलापन हमें नग्नता की ओर आकर्षित कर रहा है और फिल्मकार भी अन्य व्यवसायियों की तरह बाजार में मांग का आकलन कर लेते हैं और वैसा माल बनाते हैं। भंसाली की 'रामलीला' का नायक धोती कितना नीचे बांधेगा और नायक-नायिका में शरीर प्रदर्शन की होड़ कितना लाभ पहुंचायेगी यह बात वह समझता है। आमिर खान इस खेल का निष्णात खिलाड़ी है परंतु उसके सामाजिक सरोकार उसे महान बनाते हैं। वह यह भी मानता है कि बॉक्स ऑफिस की सफलता सामाजिक प्रतिबद्धता वाली फिल्म के लिए कितनी आवश्यक है।




































Source: Market of Nudity and Greed for Market - Parde Ke Peeche By Jaiprakash Chouksey - Dainik Bhaskar 8th January 2014