Monday, January 6, 2014

There Is A Lot Of Similarity In The Success of Human Being And An Oak Tree - Management Funda - N Raghuraman - 6th January 2014

इंसान और ओक के पेड़ की तरक्की में काफी समानता है 

मैनेजमेंट फंडा - एन. रघुरामन 


वह कुछ-कुछ प्रेशर कुकर हालात में बड़ा हुआ था। यानी बहुत ही दबाव वाली स्थितियों में। अपने पिता से बहुत डरता था, लेकिन उन पर उसे भरोसा भी बहुत था। पिता उसके हीरो थे। वह उनकी पूजा करता था। क्यों? क्योंकि कितना भी व्यस्त शेड्यूल हो, जब भी उसे जरूरत पड़ी वे हमेशा मौके पर मौजूद रहे। उन्होंने उसके स्कूल के हर कार्यक्रम को अटेंड किया। यहां तक कि वे उसके स्कूल के हर दोस्त को जानते थे। वास्तव में देखा जाए तो उसके पिता बहुत शानदार इंसान थे। ये बात और है कि वे थोड़े सख्त थे। 

Source: There Is A Lot Of Similarity In The Success of Human Being And An Oak Tree - Management Funda By N Raghuraman - Dainik Bhaskar 6th January 2014

अपने पिता की इसी सख्ती से वह भयभीत रहता था। इतना भयग्रस्त कि एक बार तो वह बीमार पड़ गया। पिता ने क्या किया? उन्होंने अपनी हर बिजनेस मीटिंग कैंसिल कर दीं। सभी टूर और ट्रेवल के कार्यक्रम रद्द कर दिए। सेके्रटरी को घर पर ही बुला लिया। जितनी बेहद जरूरी मीटिंग थीं वे घर पर ही कीं। और यह सिर्फ एक दिन की एक्सरसाइज नहीं रही। पूरे दो महीने यही चला, जब तक उनका बेटा अपने पैर पर चलने नहीं लगा। फिर स्कूल नहीं जाने लगा। बेटे की बीमारी के दौरान वे बेहद तनाव में रहे।

इस तनाव को दूर करने के लिए उन्होंने कभी-कभार पेंटिंग भी की। वह दौर गुजर गया। फिर जब वह 15 साल का हो गया तो उसके पिता उसे अपने साथ बिजनेस मीटिंग में ले जाने लगे। वह चुपचाप उन मीटिंग में बैठा रहता। जब वे खत्म होतीं तो पिता से ढेरों तरह के सवाल करता। वे धीरज से उसके हर सवाल का जवाब देते। क्योंकि वे चाहते थे कि वह बिजनेस से संबंधित अपनी हर जिम्मेदारी को ठीक से समझे। पिता और बेटे के बीच भरोसे की डोर कितनी मजबूत थी, इसका अंदाजा एक वाकये से लगाइए।

बेटा बीकॉम का एग्जाम दे रहा था। दो हफ्ते बचे थे। तभी पिता ने बेटे से कहा कि उसे सीए (चार्टर्ड अकाउंटेंट का कोर्स) करना चाहिए। बेटे से बिना सोचे उनकी सलाह मान ली। बेटे के दोस्तों को सलाह ठीक नहीं लगी। उन्हें लगा कि पिता और बेटे दोनों पागल हो गए हैं। लेकिन पिता ने बताया था कि युवा अवस्था में सिर्फ काम ही है जो आगे ले जा सकता है। बच्चे ने भी उनकी बात को अक्षरश: अपनाया। नतीजा ये हुआ कि 22 साल की उम्र से पहले ही उसने ग्रेजुएशन और सीए की परीक्षा दोनों पास कर लीं।

इसके बाद उसके पिता ने उसे एमबीए करने के लिए लंदन भेज दिया। वहां उसकी कक्षा में सभी स्टूडेंट्स 29 साल की उम्र या उससे ज्यादा थे। लेकिन वह सिर्फ 22 साल का। लेकिन उसके पास अपनी उम्र से बड़े साथी छात्रों के बराबर योग्यता थी। डिग्री थी। जिन पिता-पुत्र का यहां जिक्र किया है, वे हैं आदित्य बिड़ला व उनके बेटे कुमार मंगलम। कुमार को पता नहीं था कि उन्हें तेज रफ्तार से आगे-आगे की चीजें क्यों सिखाई जा रही हैं। लेकिन पिता को मालूम था कि उन्हें अपने बेटे को ड्राइविंग सीट पर बिठाना है।

भारी-भरकम पारिवारिक बिजनेस की ड्राइविंग सीट के लिए कुमार की तेज रफ्तार परवरिश हो रही थी। आखिरी दो साल में आदित्य की तबीयत कुछ ज्यादा खराब रहने लगी। तब उन्होंने कुमार की परवरिश, शिक्षा दीक्षा की रफ्तार और तेज कर दी। पुरानी कहावत है, 'छोटे बीज पर ओक (शाहबलूत) का बड़ा पेड़ खड़ा होता है।' बच्चों को उनके भविष्य की उम्मीदों के लिहाज से यह कहावत कारगर है। इंसान खुद भी ओक का पेड़ हो सकता है। लेकिन इसके लिए उसे ओक जैसे ही बीज की जरूरत भी होती है।

लेकिन याद रखना होगा कि ओक का पेड़ रातों-रात में खड़ा नहीं होता। उसे अपनी ऊंचाई तक पहुंचने में 30 साल तक लग जाते हैं। और इतने पर भी उसे युवा पेड़ माना जाता है। यानी उसमें तब भी बढ़त की गुंजाइश होती है। इंसान की बढ़त भी ऐसी ही होनी चाहिए।


फंडा यह है कि...

सपना तो सपना है। उस सपने को लक्ष्य बना लेना चाहिए। फिर उस लक्ष्य तक पहुंचने की योजना बनानी चाहिए। उसे पूरा करने के काम करना चाहिए।

काम के दौरान कभी थकना नहीं। पीछे हटना नहीं। और फिर जब आप लक्ष्य तक पहुंचेंगे तो ओक के पेड़ की मानिंद विशालकाय होंगे। अपने व्यक्तित्व से। सफलता से। 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 Source: There Is A Lot Of Similarity In The Success of Human Being And An Oak Tree - Management Funda By N Raghuraman - Dainik Bhaskar 6th January 2014