Thursday, January 9, 2014

Check Your Facts Before You Protest and then Speak - Management Funda - N Raghuraman - 9th January 2014

विरोध करने से पहले जानिए, फिर बोलिए...

मैनेजमेंट फंडा - एन. रघुरामन 

 

केस स्टडी: 

सुशील शुक्ला मध्यप्रदेश के इंदौर शहर में स्टूडेंट है। कॉलेज में पढ़ता है। इस साल 31 दिसंबर और एक जनवरी की दरम्यानी रात वह और उसके कुछ दोस्त एक छात्रा को घर छोडऩे गए। इससे पहले उन सभी ने पार्टी की थी। इसमें किसी ने शराब नहीं पी थी। जब वे छात्रा को छोड़कर लौट रहे थे तो उनकी गाड़ी चेकिंग के लिए रोकी गई। सुशील का ड्राइविंग लाइसेंस चेक किया गया और इंश्योरेंस पेपर मांगे गए। उसके पास सभी कागज थे, सिर्फ इंश्योरेंस पेपर नहीं थे। दरअसल, इंश्योरेंस कंपनी से नए कागज मिले ही नहीं थे। मोबाइल पर इंश्योरेंस कंपनी ने एक एसएमएस भेजा था। जिसमें लिखा था कि इंश्यारेंस पॉलिसी रिन्यू हो चुकी है, दस्तावेज जल्द ही उसके पते पर भेज दिए जाएंगे। इसमें पॉलिसी नंबर और तारीख भी बताई गई थी। लेकिन पुलिस वाले कहां मानने चले। उन्होंने सुशील और उसके दोस्तों को खूब बेइज्जत किया। छात्रों का दावा है कि मौके पर मौजूद सब इंस्पेक्टर ने कहा, 'तुम पढ़े-लिखे गंवारों को मैं डंडे दूंगा तो सारी अकल ठिकाने आ जाएगी।' अब इन छात्रों का मुद्दा ये है कि क्या उस सब इंस्पेक्टर को इस तरह किसी को बेइज्जत करने की छूट मिली हुई है? उस दिन के बाद से ये सभी लड़के कई महत्वपूर्ण जगहों पर दस्तक दे चुके हैं। जिम्मेदार अधिकारियों को पत्र लिख रहे हैं। हालांकि अब तक ये सभी इधर-उधर चक्कर ही लगा रहे हैं। उन्हें कोई नतीजा नहीं मिला है। 
 
Source: Check Your Facts Before You Protest and then Speak - Management Funda By N Raghuraman - Dainik Bhaskar 9th January 2014

संभावित समाधान: 

 सरकारी कर्मचारी, खासकर पुलिस वाले ड्यूटी के वक्त आम आदमी से बात करते हुए इज्जत से पेश क्यों नहीं आते? क्या केंद्र और राज्य सरकारों ने कर्मचारियों के लिए व्यवहार संबंधी कोई गाइडलाइन्स तय की हैं? अगर हां तो वे क्या हैं? क्या सरकारी कर्मचारियों को आम जनता से अच्छे व्यवहार का प्रशिक्षण दिया गया है? क्या इस तरह का प्रशिक्षण उनकी ट्रेनिंग का हिस्सा है? छह जनवरी को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने केंद्र और राज्य सरकार से इन सवालों का जवाब मांगा है। दो हफ्ते के अंदर सरकारों को हलफनामा देकर इन सवालों के जवाब देना है। हाईकोर्ट में नैतिक पार्टी नामक दल ने याचिका लगाई है। संस्था ने कोर्ट को बताया कि उसने एक सर्वे किया है। इसमें सामने आया है कि सरकारी कर्मचारी खासकर पुलिस वाले आम जनता से अच्छा व्यवहार नहीं करते। संस्था के वकील सीबी पांडे के मुताबिक, संविधान में कहा गया है कि आम आदमी की गरिमा की रक्षा करना सरकार की जिम्मेदारी है। संविधान के अनुच्छेद 21 में कहा गया है कि सरकार नागरिकों को गरिमा और सम्मान पूर्ण जिंदगी जीने का अवसर उपलब्ध कराएगी। लेकिन संविधान के इस प्रावधान को पूरी तरह नजरंदाज किया जा रहा है। वे कहते हैं कि जब भी सरकारी कर्मचारी किसी विधायक या सांसद से बात करते हैं तो उनकी जुबान में नरमी होती है। लेकिन जब वे किसी आम आदमी खासकर गरीब या दलित से बात करते हैं तो उनका व्यवहार अशिष्ट हो जाता है। इस तरह संविधान की भावना का उल्लंघन होता है। हाईकोर्ट की बेंच ने इस मुद्दे को गंभीरता से लिया है।

कोर्ट ने खुद पहल करते हुए इस मामले में सरकारों को नोटिस जारी किया। वरिष्ठ वकील आईबी सिंह को कोर्ट ने न्याय मित्र भी नियुक्त किया है। ताकि मामले में उनसे सहयोग लिया जा सके। अब कुछ सवाल। हममें से कितने लोग जानते हैं कि संविधान हमारे मूल अधिकारों का संरक्षण करता है? कितने लोग मानते हैं कि उनके साथ सम्मानित व्यवहार किया जाना चाहिए? चाहे भले ही वह सरकारी कर्मचारी हो, पुलिस वाला या कोई और? जब तक हम गलत साबित नहीं होते उसे हमारे साथ बदसलूकी करने का अधिकार नहीं है? इन सवालों के जवाब कई लोगों के पास 'हां' में होंगे। लेकिन हो सकता है कुछ के पास 'न' में भी हों। तो फिर?.....
 

फंडा यह है कि...

अगर आप किसी घटनाक्रम से परेशान हैं। कहीं आपको दरकिनार किए जाने का अहसास हो रहा है, तो विरोध करने से बेहतर है कि आप ज्ञान हासिल कीजिए। जानकारियां जुटाइए। फिर मोर्चा खोलिए। जीत आपकी होगी। 

 

 
































Source: Check Your Facts Before You Protest and then Speak - Management Funda By N Raghuraman - Dainik Bhaskar 9th January 2014