Tuesday, January 14, 2014

Understand The Power of A Single Lone Man - Management Funda - N Raghuraman - 14th January 2014

अकेले आदमी की ताकत को भी समझिए

मैनेजमेंट फंडा - एन. रघुरामन 


पहली कहानी: 
 
ओडिशा के भुवनेश्वर में निराकार मल्लिक लिफ्ट एरिगेशन कॉर्पोरेशन में ठेके पर काम करते हैं। वे यहां मोटर पंप ड्राइवर हैं। लेकिन वे एक चीज से व्यथित थे। नजदीकी केंद्रपाड़ा जिले के अलियाहा गांव में लोग बाढ़ और तूफान जैसी प्राकृतिक विपदाओं से जूझ रहे हैं। अलियाहा निराकार का पैतृक गांव है। सिंचाई विभाग में काम करते हुए उनको सिखाया गया था कि ऐसी समस्याओं का स्थायी समाधान है पानी स्रोतों के इर्द-गिर्द पौधे लगाए जाएं। इससे मिट्टी का क्षरण रुकेगा। और पानी को बेकार बहने से रोका जा सकेगा। 
 
Source: Understand The Power of A Single Lone Man - Management Funda By N Raghuraman - Dainik Bhaskar 14th January 2014 
निराकार दलित समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। यह 1992 की बात है। उस वक्त 52 साल के निराकार ने एक मिशन अपने हाथ में लिया। उन्होंने अलियाहा गांव की खाली पड़ी सरकारी जमीन पर पौधे रोपना शुरू कर दिया। जब उन्होंने यह काम शुरू किया तो कई लोगों को लगा कि उन्हें कोई सनक चढ़ी है। यह भी लगा कि शायद वे सरकारी जमीन पर कब्जा करना चाहते हैं। हालांकि कुछ पढ़े-लिखे लोग उनकी मदद को भी आगे आए। ब्लॉक स्तर के स्थानीय अधिकारियों और वन विभाग के लोगों ने मदद की। निराकार को मुफ्त में पौधे उपलब्ध कराए। इसी बीच 2001 में निराकार की नौकरी चली गई। सरकारी खर्चों में कटौती की मार उनकी नौकरी पर पड़ी। लेकिन तब तक वे पौधे जो उन्होंने अपने गांव की सरकारी जमीन पर रोपे थे, आधे पेड़ बन चुके थे। उन पेड़ों ने निराकार को फुर्सत से नहीं बैठने दिया। और आज उस पूरे इलाके में अच्छा-खासा जंगल तैयार हो चुका है। वो जमीन जो बंजर सी दिखती थी। जिस पर पहले लोग कचरा डालते थे, अब हरी-भरी है। पेड़ पूरी ऊंचाई पा चुके हैं। प्रशासन भी इस जंगल को बचाए रखने की अब पूरी कोशिश कर रहा है। क्योंकि यह मिट्टी का कटाव रोक रहा है।

दूसरी कहानी: 
 
तीन साल पहले वह एक भिखारिन से मिला था। उस महिला को तब कुछ दवाइयों की जरूरत थी। उसने उस महिला की मदद की थी। और अगले हफ्ते जब वह महिला उसको मिली तो उसे खूब दुआएं दीं। उसे गले से लगा लिया। उससे कहने लगी, 'तुम मेरे बेटे की तरह हो। तुमने मुसीबत में मेरी मदद की।' उसी दिन से रघु मकवाना ने तय कर लिया कि उस बूढ़ी मां को वह कभी भूखा नहीं रहने देगा। रघु ने उसे और उसके पति को शुरू-शुरू में गेहूं का आटा उपलब्ध कराना शुरू कर दिया। और फिर धीरे-धीरे खाना ही देने लगा। कुछ दिन बाद हालत यह हो गई कि जब भी रघु उन लोगों के पास नहीं आ पाता वे दोनों भूखे ही रह जाते। इसलिए रघु ने रोज का काम बना लिया कि वह अपने गोद लिए माता-पिता के पास जरूर जाएगा। रघु जिस जगह काम करता था वहां से भी उसे 10,000 रुपए की मदद मिली। इस बीच उसके गोद लिए हुए माता-पिता की तरह के कुछ और लोग उसकी ओर देखने लगे। मदद पाने के लिए। रघु ने भी किसी को निराश नहीं किया। धीरे-धीरे उन जरूरमंदों की संख्या बढऩे लगी। इधर रघु को भी उसके इस काम में लोगों की मदद मिलने लगी। हालांकि उसे यह पता नहीं होता था कि वह जरूरतमंदों के लिए अगले समय के भोजन का इंतजाम कैसे करेगा। लेकिन किसी न किसी तरह व्यवस्था हो जाती। और इसी तरह तीन साल से चल रहा यह सिलसिला अब तक बदस्तूर जारी है। आसपास के 18 लोगों को रघु दो जून का भोजन दे रहा है। रघु की एजेंसी के मालिक जयेश पटेल ने उसे एक दोपहिया वाहन दिया है। ताकि वह जरूरतमंदों तक समय पर भोजन पहुंचा सके। रघु को आज पूरे गुजरात से मदद मिल रही है। कुछ लोग तो सप्ताह में एक दिन उपवास रखकर भी उसे मदद दे रहे हैं। 
 

फंडा यह है कि...

कई लोग कहते हैं, 'मैं अकेला क्या कर सकता हूं?' तो उन्हें बताइए कि अकेले वे पहाड़ हिला सकते हैं। जंगल खड़ा कर सकते हैं। सैकड़ों लोगों का पेट भर सकते हैं। बस इरादा होना चाहिए। अकेले-दुकेले से कोई फर्क नहीं पड़ता।

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
Source: Understand The Power of A Single Lone Man - Management Funda By N Raghuraman - Dainik Bhaskar 14th January 2014