Tuesday, December 24, 2013

Multi Dimensional Effects Of Sensation Lovers - Parde Ke Peeche - Jaiprakash Chouksey - 24th December 2013

सनसनी प्रियता के बहुआयामी प्रभाव 

परदे के पीछे - जयप्रकाश चौकसे


आदित्य चोपड़ा की फिल्म 'धूम 3' पहले तीन दिन में सौ करोड़ की आय का आंकड़ा पार कर चुकी है। धूम के पहले दो भागों के चोर पात्रों के पास चोरी करने के कोई ठोस कारण नहीं थे। रितिक अभिनीत भाग दो में तो वह डकैती महज थ्रिल के लिए डालता है। हॉलीवुड की 'बोनी एंड क्लाउड' के युवा अपराधी केवल अपने मनोरंजन के लिए डाके डालते हैं, हत्या करते हैं। फिल्म का पुलिस अफसर कहता है कि इन दोनों चोरों के जिस्म में सरेआम सैकड़ों गोलियां मारनी होंगी ताकि समाज में मात्र थ्रिल के लिए युवा वर्ग अपराधी नहीं बने। इस फिल्म से प्रेरित आदित्य चोपड़ा ने ही 'बंटी और बबली' बनाई थी परंतु उसका पुलिस अफसर उन्हें दंडित नहीं करता। दरअसल 'बंटी और बबली' 'बोनी एंड क्लाउड' का अत्यंत 'शाकाहारी' संस्करण था और उसके सामाजिक संदेश को गायब कर दिया गया था। पाठकों को स्मरण होगा कि कुछ वर्ष पूर्व कुछ अमीरजादों ने शौकिया चोरी की थी और वे पकड़े गए थे। आर्थिक व अन्य किसी मजबूरी से किया गया अपराध अलग श्रेणी में आता है क्योंकि उसमें निर्मम व्यवस्था अपराध की अदृश्य भागीदार होती है और उसे कभी कठघरे में खड़ा नहीं किया जा सकता। इस तथाकथित थ्रिल के लिए कमसिन उम्र में सिगरेट और शराब पी जाती है तथा आजकल ड्रग्स का सेवन किया जाता है। 

Source: Multi Dimensional Effects Of Sensation Lovers - Parde Ke Peeche By Jaiprakash Chouksey - Dainik Bhaskar 24th December 2013


बहरहाल मनोरंजन जगत में एंटी हीरो अर्थात प्रतिनायक छवि भी एक आजमाया हुआ फार्मूला है। इसके साथ ही रॉबिनहुड परंपरा भी रही है जिसमें अमीरों को लूटकर धन गरीबों में बांटा जाता है। चंबल के दस्यु भी दान में विश्वास करते थे। दरअसल डाकुओं द्वारा लूट का कुछ भाग गांव वालों में बांटना उनकी सुरक्षा नीति का एक हिस्सा है क्योंकि इस तरह वे अपने 'खबरी' रचते हैं जो उन्हें पुलिस के इरादों की जानकारी देते हैं। संगठित अपराध जगत में भी लोगों की मदद करना उनकी सुरक्षा नीति का हिस्सा है और संगठित अपराध सरगना गरीब की दुआ को असरकारक मानता है और उसकी खतरों भरी जिंदगी में वह अपने बचे रहने का श्रेय दुआओं को देता है। 'वन्स अपॉन ए टाइम इन बॉम्बे' का नायक भिखारन को पैसे देते समय कहता है, 'अपनी दुआ में मुझे शामिल करना।' आज जीवन में भ्रष्ट नेता और अफसर वे लोग हैं जिनकी 'दुआ' कबूल कर ली गई है और भूखे की प्रार्थना का स्वर इतना कम है कि वहां तक नहीं पहुंचता जहां 'दुआएं' कबूल की जाती हैं। जब से समाज में अनार्जित धन पाने वालों की संख्या बढ़ी है तथा नाकाबिल नाकारे सफल व्यक्ति हो गए हैं तब से धार्मिक स्थानों पर भीड़ बढ़ गई है। इस वर्ष भी विगत कुछ वर्षों की तरह इकतीस दिसंबर को भीड़ या तो पांच सितारा होटलों में होगी या धार्मिक स्थानों पर।

बहरहाल कुछ युवा दर्शकों का कहना है कि 'धूम 3' का नायक अपनी पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए उस बैंक को तबाह करना चाहता है जिसने उसे ऋण चुकाने की मियाद नहीं दी। यह ब्रांड धूम से अलग है, फिर इसमें दो भाइयों के बीच का प्रबल प्रेम भी है और इस बंधन को उनके बचपन से ही स्थापित किया है। इस थ्रिलर में संवेदना को महत्वपूर्ण स्थान देकर इसे पारिवारिक दर्शकों की फिल्म बनाने का प्रयास किया गया है और कुछ इस बात को पसंद नहीं कर रहे हैं। सिनेमाघर में अभिव्यक्त यह संवेदना पर नाराजगी कदाचित पूरे समाज की हृदयहीनता की ओर संकेत कर रही है। सफलता, संपत्ति और लोकप्रियता के लिए घोर आग्रह रखने वाले समाज में संवेदना का तिरस्कार भी संभव है।

यह अजीब बात है कि संपत्ति बढऩे के अनुपात में संवेदना घटती है और विनम्रता का स्वांग भी बढ़ता है। दरअसल संपत्ति से अधिक उसका लालच एवं अहंकार संवेदना को हानि पहुंचाता है। यह एक लोकप्रिय बात है कि भारतीय व्यक्ति पश्चिम के व्यक्ति की तुलना में ज्यादा भावुक होता है। इसका तात्पर्य संभवत: यह है कि बुद्धि और तर्क का प्रयोग हम कम करते हैं। भावुकता प्राय: लिजलिजी सी चीज है और भावना की इस अभिव्यक्ति में ढोंग बड़ा हिस्सा है। आश्चर्य इस बात का भी है कि युवा अवस्था में प्रेम की भावना प्रबल होती है, अत: उन्हें फिल्म का भावना पक्ष प्रबल लगना चाहिए परंतु यह संभव है कि आज युवा को संवेदना से अधिक सनसनी के प्रति आकर्षण है औ अनेक प्रेम प्रसंग सनसनी रचने का हिस्सा बन चुके हैं। प्रेम को भी एडवेंचर बना दिया गया है।

समाज शास्त्र के विशेषज्ञ ही रोशनी डाल सकते हैं कि विगत दशकों में संवेदना कम क्यों हो गई हैं! कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारी निर्मम व्यवस्था ने सामाजिक न्याय को हाशिए को डाल दिया है और समानता तथा सामाजिक न्याय के आदर्श के लोप होने के कारण संवेदनाएं घटी हैं। व्यवस्था की क्रूरता का ही यह साइड इफेक्ट है। आजकल यह भी लोकप्रिय है कि राजनीति में निर्ममता होती है, जबकि अवाम के मनों पर और उनकी खुशहाली से संबंधित राजनीति को भावना प्रधान होना चाहिए था परंतु ऐसा नहीं हो पाया। यह बात महज धूम की नहीं है वरन् सनसनी द्वारा संवेदना का स्थान लेने से जुड़ी है। 



































Source: Multi Dimensional Effects Of Sensation Lovers - Parde Ke Peeche By Jaiprakash Chouksey - Dainik Bhaskar 24th December 2013