Tuesday, December 3, 2013

If You Want To Know The Limits of Possibility, Then Go Past The Impractical Limits - Management Funda - N Raghuraman - 3rd December 2013

संभव की सीमा जाननी है तो असंभव के पार जाइए

मैनेजमेंट फंडा - एन. रघुरामन 

 

बदनगढ़ी राजस्थान के अलवर जिले का एक गांव है। सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक इस गांव की आबादी महज 169 है। इतनी कम आबादी वाले गांव में स्कूल, सार्वजनिक शौचालय, ठीक-ठाक सड़क, पानी या बिजली के कनेक्शन की उम्मीद करना बेमानी ही है। और ऐसे गांव में रहने वाले लोग भला क्या सोचते होंगे। शायद यह कि यही उनकी किस्मत है, लेकिन मणिराम शर्मा नाम के उस बच्चे ने ऐसा नहीं सोचा। वह उस रास्ते पर आगे बढ़ा जिस पर चलने से बाकी लोग झिझकते रहे। वह रोज गांव से पूरे पांच किलोमीटर दूर पैदल चलकर स्कूल में पढ़ने जाता। अचानक तभी उसे एक दिन अहसास हुआ कि उसको सुनने में परेशानी है। गांव में स्वास्थ्य सुविधा तो थी नहीं। तो मणिराम का इलाज कैसे होता। फिर उसने इन्हीं हालात में 10वीं और 12वीं की परीक्षा में टॉप किया। राज्य बोर्ड की 10वीं की परीक्षा में वह मैरिट लिस्ट में पांचवें और 12वीं में सातवें नंबर पर रहा। 

स्रोत:  If You Want To Know The Limits of Possibility, Then Go Past The Impractical Limits - Management Funda By N Raghuraman - दैनिक भास्कर 3rd December 2013

इसके बाद 1997-98 में वह टोंक जिले के देवली में सरकारी कॉलेज में लेक्चरर हो गया। उसे अहसास हुआ कि उसकी सुनने की क्षमता 100 फीसदी खत्म होने के करीब पहुंच चुकी है। वह रुका नहीं। पढ़ाते-पढ़ाते उसने राजनीति विज्ञान में पीएचडी कर ली। फिर राजस्थान यूनिवर्सिटी में एमए और एमफिल के स्टूडेंट्स को पढ़ाने लगा। उसने राजस्थान प्रशासनिक सेवा की परीक्षा दी, लेकिन जल्द ही इंडियन सिविल सर्विस को लक्ष्य बना लिया। आज 34 साल की उम्र में मणिराम दिल्ली में असिस्टेंट कंट्रोलर ऑफ कम्युनिकेशन अकाउंट के पद पर है। यह पद उसे यूपीएससी की परीक्षा के जरिए मिला है। लेकिन यहां तक पहुंचना भी आसान नहीं था। उसने 2005 में यूपीएससी की परीक्षा पास कर ली थी। सबसे मुश्किल पर्सनल इंटरव्यू के चरण में उसने 300 में से 243 अंक हासिल किए। किसी भी अन्य उम्मीदवार की तुलना में सबसे ज्यादा। यह इसलिए संभव हो पाया, क्योंकि मणिराम होंठों के मूवमेंट से समझ जाता था कि सामने वाला क्या कह रहा है।

सफलता के बावजूद मणिराम को यूपीएससी ने बिना कोई पद दिए घर वापस भेज दिया, क्योंकि वह सुन नहीं सकता था। उसने डॉक्टरी जांच का सर्टिफिकेट भी पेश किया था। इसमें बताया गया था कि उसकी सुनने की क्षमता 50 फीसदी कम है। लेकिन यूपीएससी की मेडिकल टीम ने कहा कि वह 100 फीसदी नहीं सुन सकता, इसलिए उसे कोई पद नहीं मिल सकता। यह सब तब हुआ जबकि सिविल सर्विस की परीक्षाओं में शारीरिक रूप से असमर्थ लोगों के लिए आरक्षण का अनिवार्य कोटा है। मणिराम ने 2006 में फिर परीक्षा दी। कम सुन सकने वाले उम्मीदवारों के समूह में उसके सबसे ज्यादा नंबर आए।


मणिराम के नंबरों के हिसाब से आईएएस का पद मिलना था, लेकिन सुनने में असमर्थ उम्मीदवारों को आईएएस बनाना प्रतिबंधित हो चुका था। इसलिए उसे पोस्ट एंड टेलीकम्युनिकेशन फाइनेंस एंड अकाउंट सर्विस (पीटीएफएएस) मिली। 2009 में उसने फिर यूपीएससी की परीक्षा दी। पास भी हुआ, लेकिन इस बार भी कोई पद नहीं मिला। मणिराम ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। केस चल रहा है। मणिराम ने 7.5 लाख रुपए खर्च कर ऑपरेशन कराया है। इसमें उसके कान के भीतर कृत्रिम यंत्र डाला गया है। इससे वह कुछ हद तक सुनने में सक्षम हो पाया है। सर्जरी को कोहलियर इंप्लांट कहते हैं। सरकारी अस्पतालों में इस सर्जरी की सुविधा नहीं है। वहां यह परीक्षण भी नहीं हो सकता कि यह सर्जरी करा चुके लोग कितने फीसदी तक सुनने में सक्षम हो जाते हैं। मणिराम के डॉक्टरों की दलील यही है। उनके मुताबिक, जब सरकारी अस्पतालों में सुविधा नहीं है तो वे यह कैसे कह सकते हैं कि उनका मरीज 100 फीसदी नहीं सुन सकता। दूसरी तरफ निजी अस्पतालों की रिपोर्ट और मणिराम के डॉक्टरों की दलीलों को यूपीएससी मानने के लिए तैयार नहीं है। इस सबके बीच मणिराम न्याय के लिए अब भी इंतजार कर रहा है। राजस्थान के छोटे से गांव में बचपन से शुरू हुआ उसका संघर्ष देश की राजधानी दिल्ली में युवा होने तक जारी है।


फंडा यह है कि..

आपका हौसला झुक नहीं सकता। आरजू रुक नहीं सकती। खासकर, तब जबकि आपने संभव की सीमा का पता लगाने के लिए असंभव के पार जाने का फैसला कर लिया हो।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

  

स्रोत:  If You Want To Know The Limits of Possibility, Then Go Past The Impractical Limits - Management Funda By N Raghuraman - दैनिक भास्कर 3rd December 2013