Sunday, December 22, 2013

Engineering Students Mission - To Provide Cheap Treatment - Management Funda - N Raghuraman - 22nd December 2013

सस्ते इलाज के मिशन में जुटे इंजीनियरिंग छात्र 

मैनेजमेंट फंडा - एन. रघुरामन 


कई राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पेश किए मॉडल्स से साफ है कि इंजीनियरिंग छात्र मेडिकल प्रोफेशन को गंभीरता से ले रहे हैं। उनका जोर लोगों को किफायती स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने पर है।

1. हर साल कई महिलाओं की पोस्टपार्टम हेमरेज की वजह से मौत हो जाती है। इसमें डिलीवरी के बाद बहुत ज्यादा ब्लीडिंग होती है। कारण गर्भाशय में प्लेसेंटा रह जाना या लचीलापन नहीं होना है। इस समस्या को दूर करने के लिए चेन्नई के एसएसएन कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग के पांच छात्रों ने एक महीने में गर्भाशय को गरमाहट देने की तकनीक ईजाद की, जिससे खून जमाया जा सके। उन्होंने पाया कि अति सूक्ष्म कण आपस में टकराने पर गरमाहट पैदा करते हैं। जो गर्भाशय की अंदरूनी दीवारों की गरमाहट के लिए पर्याप्त है। इससे लीक हो रही खून की कोशिकाओं को जमाने की प्रक्रिया शुरू हो सकती है। 

Source: Engineering Students Mission - To Provide Cheap Treatment - Management Funda By N Raghuraman - Dainik Bhaskar 22nd December 2013


2. दिल के मरीजों के लिए तमिलनाडु के नॉलेज इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी सलेम के तीन छात्रों ने एक उपकरण बनाया है। जो मरीज को बिजली का झटका देकर या वाइब्रेशन से धमनियों में बने ब्लॉक्स को साफ करता है। ई-ऐडर नाम का यह उपकरण छोटे वाइब्रेशंस या जरूरत के मुताबिक बिजली के झटके पैदा करता है। इससे ब्लॉकेज के हिस्से में धमनी फैलती है और खून का बहाव सहज हो जाता है। यह इतना छोटा है कि कपड़ों के अंदर भी पहना जा सकता है। यदि किसी मरीज को दिल का दौरा पडऩे वाला हो और कोई भी उसके पास न हो तो वह बटन दबाकर अटैक से बच सकता है।

3. खडग़पुर आईआईटी के छात्रों ने कैंसर के ट्यूमर का पता लगाने के लिए हार्डवेयर-सॉफ्टवेयर कॉम्बिनेशन बनाया है। यह ग्रामीण इलाकों में पैरामेडिक्स और टेक्नीशियंस के लिए उपयोगी है। वे ट्यूमर का पता लगाकर डॉक्टरों को तस्वीर जरिए संदेश भेजते हैं। यह पेसिव टेलीमेडिसिन है। स्मार्टफोन पर लेंस-स्टाइल का कैमरा अटैचमेंट हार्डवेयर लगा है। जो एनएफसी (नियर फील्ड कम्युनिकेशन) से कनेक्टेड है। ट्यूमर स्कैन होते ही उसकी तस्वीर क्लाउड बेस्ड प्लेटफार्म पर अपलोड होती है, जिससे डॉक्टर डायग्नोसिस करते हैं।

4. वल्र्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) की 2011-12 रिपोर्ट कहती है कि दुनियाभर में 45 प्रतिशत नवजात शिशुओं की मौत सांस लेने में तकलीफ या बर्थ हायपोक्सिया से होती है। ऑक्सीजन देने के लिए सिलेंडर का इस्तेमाल होता है। जो फार्मेसी और अस्पतालों में 4-5 हजार रुपए में आता है। वेल्लूर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के तीन छात्रों की टीम ने सस्ता विकल्प सुझाया है। उन्होंने ऐसा उपकरण बनाया है, जो काफी कम खर्च पर ऑक्सीजन उपलब्ध कराता है। पानी की इलेक्ट्रोलिसिस से ऑक्सीजन सिर्फ 70 रुपए में बनाई जा सकती है। यह पोर्टेबल और काफी हल्का है। इलेक्ट्रोलिसिस के बाद ऑक्सीजन एकत्रित करने के लिए इस्तेमाल होने वाले चैम्बर्स को आसानी से एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सकता है। इसका रखरखाव भी आसान है।

5. आईआईटी वाराणसी के दो छात्रों ने टचपैड विकसित किया है। यह असाध्य और साध्य ट्यूमर को अलग करता है। अंतर समझने के लिए कोशिकाओं की इलेक्ट्रिकल प्रॉपर्टीज का अध्ययन करता है। यह उपकरण कैपेसिटंस से रीडिंग लेकर उसे डिजिटली कन्वर्ट करता है। इसकी मदद से डॉक्टर कैपेसिटंस में बदलाव नाप सकते हैं। यह बता सकते हैं कि कौन-सा ट्यूमर कैंसर का नहीं है या साध्य है, जो आगे चलकर असाध्य ट्यूमर बन सकता है। 

फंडा यह है कि...

कई इंजीनियरिंग छात्र मेडिकल फील्ड में रिसर्च कर रहे हैं। दुनियाभर में किफायती स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराना सबसे बड़ा मिशन बन चुका है। 


 
Source: Engineering Students Mission - To Provide Cheap Treatment - Management Funda By N Raghuraman - Dainik Bhaskar 22nd December 2013